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मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, August 26, 2012

जब भी चाहें एक नई सूरत बना लेते हैं लोग -Qateel

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जब भी चाहें एक नई सूरत बना लेते हैं लोग
एक चेहरे पर कई चेहरे सजा लेते हैं लोग

मिल भी लेते हैं गले से अपने मतलब के लिए
आ पड़े मुश्किल तो नज़रें भी चुरा लेते हैं लोग

है बजा उनकी शिकायत लेकिन इसका क्या इलाज
बिजलियाँ ख़ुद अपने गुलशन पर गिरा लेते हैं लोग

हो ख़ुशी भी उनको हासिल ये ज़रूरी तो नहीं
  ग़म छुपाने के लिए भी मुस्कुरा लेते हैं लोग

ये भी देखा है कि जब आ जाये ग़ैरत का मक़ाम
अपनी सूली अपने काँधे पर उठा लेते हैं लोग 

7 comments:

Shikha Kaushik said...

divy shayri

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत ख़ूब!
आपकी यह सुन्दर प्रविष्टि कल दिनांक 27-08-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-984 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

sangita said...

कतील को पढ़ते ही जगजीत सिंह जी की याद आती है सलाम|

Shalini kaushik said...

nice presentation.iतुम मुझको क्या दे पाओगे?

पुरुषोत्तम पाण्डेय said...

ऐसे ही होते हैं लोग. गुनगुनाते रहिये.

पुरुषोत्तम पाण्डेय said...

ऐसे ही होते हैं लोग. गुनगुनाते रहिये.

सुशील कुमार जोशी said...

कुछ लोग पुरानी सूरत से काम चला लेते हैं
नयी सूरत को किराये पर चढा़ देते हैं !