Pages

मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Tuesday, August 28, 2012

दायरा दर दायरा बस दर्द है Gazal


ग़ज़ल

दायरा दर दायरा बस दर्द है
दश्ते दिल है बेबसी की गर्द है

आग इक सुलगी हुई है कर्ब की
सांस लेती हूं तो आहे सर्द है

नख्ले जां को ख़ूं पिलाया उम्र भर
शाख़े हस्ती आज भी जाने क्यूं ज़र्द है

खोजने निकली मैं अपने आप को
मैंने देखा लापता हर फ़र्द है

किस तरह ‘आशी‘ सुकूं मिलता मुझे
सोच का हर पहर ही बेदर्द है

शब्दार्थः
दश्ते दिल - दिल का जंगल, गर्द-धूल,
कर्ब-कष्ट, नख्ले जां-वुजूद का बाग़,
ज़र्द-पीला, फ़र्द-व्यक्ति, सुकूं अर्थात सुकून-शांति

19 comments:

Sadhana Vaid said...

बहुत ही बेहतरीन गज़ल ! हर शेर दर्द में डूबा हुआ ! बहुत सुन्दर !

मनोज कुमार said...

नख्ले जां को ख़ूं पिलाया उम्र भर
शाख़े हस्ती आज भी जाने क्यूं ज़र्द है
आज हर तरफ़ ऐसा मौसम है कि ये हालात बन पड़े हैं।

Shalini kaushik said...

नख्ले जां को ख़ूं पिलाया उम्र भर
शाख़े हस्ती आज भी जाने क्यूं ज़र्द है
बहुत दर्द भरी प्रस्तुति .तुम मुझको क्या दे पाओगे?

सुशील कुमार जोशी said...

वाह !

खोजने निकली मैं अपने आप को
मैंने देखा लापता हर फ़र्द है

Kunwar Kusumesh said...

अच्छी ग़ज़ल पोस्ट की आपने.आशी जी को बधाई इस ग़ज़ल के लिए.

Anita said...

बेहतरीन..

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

बहुत सुंदर
क्या बात

yashoda Agrawal said...

आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 01/09/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

दिलबागसिंह विर्क said...

आपकी पोस्ट 30/8/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें

चर्चा - 987 :चर्चाकार-दिलबाग विर्क

Rajesh Kumari said...

नख्ले जां को ख़ूं पिलाया उम्र भर
शाख़े हस्ती आज भी जाने क्यूं ज़र्द है
ये शेर तो कमाल का है पूरी ग़ज़ल के लिए दाद कबूल कीजिये

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बेहतरीन गज़ल

अजय कुमार said...

umdaa hai , badhayi

मेरा मन पंछी सा said...

बहुत - बहुत सुन्दर
बढ़िया गजल....
:-)

अरुन अनन्त said...

वाह बेहतरीन उम्दा ग़ज़ल , बहुत-२ बधाई

आनंद said...

बेशक उम्दा ग़ज़ल हुई है दाद क़ुबूल करें ... तीसरे शेर में बहर टूटी लगती है गौर फरमाएँ

शाख़े हस्ती आज भी जाने क्यूं ज़र्द है

यहाँ 'जाने' हटा देने से बहर दुरस्त हो रही है और मजमून में भी कोई फर्क़ नहीं पड़ेगा ... गुस्ताखी मुआफ़!

Madan Mohan Saxena said...

बहुत शानदार ग़ज़ल शानदार भावसंयोजन हर शेर बढ़िया है आपको बहुत बधाई

yashoda Agrawal said...

एक बार फिर
आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 19/09/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) said...

शानदार शेर !




सादर

nayee dunia said...

बहुत सुन्दर ........