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मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Monday, May 21, 2012

इतने न कर जुल्म माँ बाप पर बन्दे !


इतने न कर जुल्म माँ बाप पर बन्दे !

दुनियावी तजुर्बा है हक़ीकत में है होता ;
जो माँ -बाप का न होता किसी का नहीं होता .

जब टोकता है उनको दो टुकड़ों के लिए ;
मुंह से कहें न कुछ पर दिल तो है रोता .

तूने भरी एक आह वे जागे रात भर
वे तडपे दर्द से तू आराम से सोता ?

जिसने करी दुआ तू रहे सलामत ;
उनकी ही मौत की तू राह है जोहता .

इतने न कर जुल्म माँ बाप पर बन्दे ;
वे सोचने लगे कि बेऔलाद ही होता .
शिखा कौशिक
'' vikhyat ''

20 comments:

sushmaa kumarri said...

bhaut hi acchi...

Kunwar Kusumesh said...

इतने न कर जुल्म माँ बाप पर बन्दे ;
वे सोचने लगे कि बेऔलाद ही होता .....kya baat hai.

shikha ji,aapka upnaam"vikhyat"pahli baar dekha.achchha laga,badhai

Shikha Kaushik said...

sushma ji v kunvar ji -shukriya .

India Darpan said...

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


इंडिया दर्पण
की ओर से आभार।

virendra sharma said...

कहता है फूंक फूंक ग़ज़लें शायर दुनिया का जला हुआ ,उसके जैसा चेहरा देखा एक पीला पता हरा हुआ .
शिखा जी ही कह सकती हैं ऐसी जली भुनी हुई ग़ज़ल .दिल में उतरती है हिमोग्लोबिन पे असर करती है .बधाई .

नीरज गोस्वामी said...

जो माँ -बाप का न होता किसी का नहीं होता

WAAH...WAAH...WAAH...BILKUL SACHCHI BAAT...BADHAI SWIIKAREN.

NEERAJ

दिगम्बर नासवा said...

दुनियावी तजुर्बा है हक़ीकत में है होता ;
जो माँ -बाप का न होता किसी का नहीं होता ...

बहुत ही सच्ची बात लिखी है ... जो माँ बाप का नहीं हो सका वो किसी का क्या होगा ...

yashoda Agrawal said...

शनिवार 26/05/2012 को आपकी यह पोस्ट नई-पुरानी हलचल पर लिंक की जाएगी. http://nayi-puranihalchal.blogspot.in
आपके सुझावों का स्वागत है

Shalini kaushik said...

bahut sahi kaha hai aapne.

प्रेम सरोवर said...

इतने न कर जुल्म माँ बाप पर बन्दे ;
वे सोचने लगे कि बेऔलाद ही होता

बहुत ही संवेदनशील पोस्ट । आ जकी पीढ़ी के लिए एक सीख । मरे पोस्ट पर आपका बेसब्री से इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

पंछी said...

prernadayi rachna ...

Saras said...

बहुत ही अभागा है वह इंसान ...जिसे इस नसीहत की ज़रुरत पड़े ..!!!

Anita Lalit (अनिता ललित ) said...

कैसी दुखभरी व शर्मनाक स्थिति !
ज़िंदगी की सुबह जिनके हौसलों से आबाद हुई..
शाम ढले... क्यों ज़िंदगी....उनसे ही बेज़ार हुई...???

Anita Lalit (अनिता ललित ) said...

कैसी दुखभरी व शर्मनाक स्थिति !ज़िंदगी की सुबह जिनके हौसलों से आबाद हुई, शाम ढले क्यों ज़िंदगी....उनसे ही बेज़ार हुई...???

यशवन्त माथुर (Yashwant Raj Bali Mathur) said...

बहुत बढ़िया सर!


सादर

मेरा मन पंछी सा said...

बहुत ही अच्छी बात कही है आपने..
जो माँ - पिता का नहीं वो किसी का नहीं...

प्रसन्नवदन चतुर्वेदी 'अनघ' PBChaturvedi said...

वाह...सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

India Darpan said...

बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


इंडिया दर्पण
पर भी पधारेँ।

DR. ANWER JAMAL said...

इतने न कर जुल्म माँ बाप पर बन्दे ;
वे सोचने लगे कि बेऔलाद ही होता ...

Nice poem.

Dr.NISHA MAHARANA said...

इतने न कर जुल्म माँ बाप पर बन्दे ;
वे सोचने लगे कि बेऔलाद ही होता....very nice...