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मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Wednesday, February 15, 2012

आइने की क्या ज़रूरत ?



रूप इतना खूबसूरत
आइने की क्या ज़रूरत

आ रहीं नज़दीक घड़ियाँ
जब बनेगा शुभ मुहूरत

बैठकर जब बात होंगी
दूर होंगी सब कुदूरत

लाख पर्दों में छुपाओ
छिप नहीं पायेगी सूरत

दिल में हमने है समायी
आपकी सुन्दर सी सूरत

आज मेरे चाँद का है
"रूप" कितना ख़ूबसूरत

10 comments:

Pallavi saxena said...

bahut sundar bhavabhivyakti ...

DR. ANWER JAMAL said...

बहुत ख़ूब !

vandan gupta said...

वाह बहुत खूबसूरत्।

sushmaa kumarri said...

बहुत ही प्यारी और भावो को संजोये रचना......

मनोज कुमार said...

शास्त्री जी , आप तो कमाल करते हैं।
छोटे बहर में इतनी खूबसूरत ग़ज़ल ...!
वाह .. वाह!!

प्रेम सरोवर said...

बहुत बेहतरीन....
मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

दर्शन कौर धनोय said...

bahut khub !

Vaanbhatt said...

बहुत खूब...

Shanno Aggarwal said...

बहुत खूबसूरत...

Satyendra Prakash said...

GUSTAAKHI MAAF!
neeche se teesari pankti me MOORAT ka istemaal karke 'soorat'ke repitition se bacha ja sakta tha..