मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, August 7, 2011

कश्ती कोई तन्हा नहीं होती The boat



धरती पर
मौसम की तरह
बदलते हैं हालात
कि इंसान भी
उपजा है
धरती से ही
और खाता है
धरती से ही
और बसेरा उसका
धरती पे ही

धरती,
जो समेटे है
अपने अंक में
हर सागर को
गागर की तरह
एक मां की भांति

टूटी कश्तियों के साथ भी
चलती हैं लहरें
बहता है पवन
झूमता है गगन
चाहे कश्ती कोई
यह सब जाने ना

वंदना जी ! आपकी रचना 'कुछ कश्तियां अकेले बहने को मजबूर होती हैं' पढ़कर अच्छा लगा और यह भाव मन में आए शायद कि आपके दिल को भाए ?

10 comments:

vandan gupta said...

आपके मन के भाव सच मे बहुत सुन्दर हैं। शुक्रिया ।

nilesh mathur said...

बहुत सुंदर।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

अच्छी रचना है!
--
मित्रता दिवस पर बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

sushmaa kumarri said...

बहुत ही खुबसूरत....

Vivek Jain said...

बहुत ही सुंदर,
साभार, विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

Dinesh pareek said...

मुझे क्षमा करे की मैं आपके ब्लॉग पे नहीं आ सका क्यों की मैं कुछ आपने कामों मैं इतना वयस्थ था की आपको मैं आपना वक्त नहीं दे पाया
आज फिर मैंने आपके लेख और आपके कलम की स्याही को देखा और पढ़ा अति उत्तम और अति सुन्दर जिसे बया करना मेरे शब्दों के सागर में शब्द ही नहीं है
पर लगता है आप भी मेरी तरह मेरे ब्लॉग पे नहीं आये जिस की मुझे अति निराशा हुई है
http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/

!!अक्षय-मन!! said...

वाह मन को छु गए कविता के अनोखे भाव


कई जिस्म और एक आह!!!

Asha Lata Saxena said...

मन को छूती भावपूर्ण प्रस्तुति |
बधाई
आशा

सु-मन (Suman Kapoor) said...

bahut sundar rachna..mere blog par aakar hausla afjaee ke liye bahut bahut shukriya..

DR. ANWER JAMAL said...

आप सभ का शुक्रिया .