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मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Tuesday, July 19, 2011

अब इज़हार नहीं करता

ये ना समझना
तुम्हें याद नहीं 
करता
निरंतर तुम्हें चाहा
दिल तुमसे लगाया
खुद के लगाए
गुलशन को
उजाड़ नहीं सकता
गुल कहीं भी खिले
उसे मुरझाते 
देख नहीं सकता 
ये बात जुदा है
अब इज़हार नहीं
करता
19-07-2011
1206-86-07-11

5 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत उम्दा!

Unknown said...

उम्दा कविता वाह

Shalini kaushik said...

बहुत भावपूर्ण .बधाई.

sushmaa kumarri said...

ये रचना ही सब कुछ कह रही है...

Shikha Kaushik said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति .आभार .