Pages

मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Saturday, July 23, 2011

तन्हाई ही हमें जीना सिखाती है.




ये जिंदगी तन्हाई को साथ लाती है,
   हमें कुछ करने के काबिल बनाती  है.
सच है मिलना जुलना बहुत ज़रूरी है,
     पर ये तन्हाई ही हमें जीना  सिखाती है.

यूँ तो तन्हाई भरे शबो-रोज़,
          वीरान कर देते हैं जिंदगी.
उमरे-रफ्ता में ये तन्हाई ही ,
        अपने गिरेबाँ में झांकना सिखाती है.

मौतबर शख्स हमें मिलता नहीं,
     ये यकीं हर किसी पर होता नहीं.
ये तन्हाई की ही सलाहियत है,
     जो सीरत को संजीदगी सिखाती है.
        शालिनी कौशिक 

8 comments:

Unknown said...

खूबसूरत शब्द , बेहतरीन शायरी शालिनी जी बधाई

sushmaa kumarri said...

बहुत ही सुंदर शब्दों से सजी रचना ....

DR. ANWER JAMAL said...

सचमुच इतनी साफ और रवाँ उर्दू देखकर ताज्जुब हुआ ।

अच्छी रचना

बहुत ऊँचा जाने के इम्कान।

शिखा कौशिक said...

bahut khoob shalini ji .badhai

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी प्रविष्टी की चर्चा कल सोमवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुणचेंगे तो हमारा यह प्रयास सफल होगा!

डा श्याम गुप्त said...

बहुत अच्छी गज़ल शालिनी जी ----मगर

"पर ये तन्हाई ही हमें रहना सिखाती है.".....में यह 'रहना' शब्द वाक्यांश का अर्थ स्पष्ट नहीं कर पारहा है....यदि 'जीना' हो तो अधिक समीचीन रहेगा....

Shalini kaushik said...

धन्यवाद डॉ.श्याम गुप्त जी

यहाँ पर अपनी ग़ज़ल प्रकाशित करने का मेरा मकसद ही यह रहता है की मेरी खामियां आप जैसे गुणी लोगों से मुझे पता चल जाएँ क्योंकि मैं ये सब कुछ लिखना बिलकुल नहीं जानती और यहाँ आप सभी को पढ़ पढ़ कर हो कुछ लिखना सीख रही हूँ.

डॉ.अनवर जमाल जी

ये आप सभी का सहयोग ही है जो मेरे उर्दू शब्दकोष में शब्द बढ़ रहे हैं आप यहाँ अर्थ सहित लिखते हैं और मेरी डायरी में वे जुड़ जाते हैं

कुश्वंश जी,शिखा जी ,सुषमा जी और डॉ.रूप चन्द्र शास्त्री जी आप सभी का उत्साह वर्धन हेतु आभार

Arun sathi said...

sundar