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मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, July 10, 2011

आँख का पानी ...ड़ा श्याम गुप्त.....

मर गया जबसे मनुज की आँख का पानी |
हर कुए तालाब नद से चुक गया  पानी |

उसने पानी को किया बरबाद कुछ ऐसे ,
रह गया हर राह जंगल खोजता पानी  |

उसने पानी का नहीं पानी रखा कोई ,
हर सुबह और शाम अब वह ढूँढता पानी |

पानी-पानी होगया हर शख्स पानी के बिना,
चाँद  पर भी खोजने वह चल दिया पानी  |

हाँ तसल्ली हुई चुल्लू भर तो पानी मिल गया,
पर  न  पानी  मांग जाए   चाँद  का  पानी  |

श्याम' पानी की व्यथा जाने जो पानीदार हो,
पानी -पानी  हो रहा,  हर आँख का पानी ||

6 comments:

रविकर said...

बहुत खूब भाई जी ||
पानी बिन सब सून ||

बधाई |

Kunal Verma said...

बहुत ही बढिया।मेरे पास टिप्पणी करने हेतु शब्द नहीँ हैँ।

vandan gupta said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (11-7-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

sushmaa kumarri said...

बहुत ही सुंदर रचना.....

DR. ANWER JAMAL said...

पानी भी यहाँ शै ख़ूब है
जीवन की बुनियाद है पानी

मज़ा है उसकी जवानी में उतना ही
जिसकी ग्रंथियों में है जितना पानी

बुढ़ापे में सूख जाता है तन बदन
कम रह जाता है हर जा पानी

पानी की महिमा सदा से है
ज़हर व अमृत देता है पानी

आपने भी ख़ूब कहा पानी पर
हमें भी याद आ गया उम्दा पानी

याद आ जाती है हरेक को नानी
गर न हो घर में दाना और पानी

समय कम है वर्ना और लिखता ,

सादर !

जा=जगह

डा श्याम गुप्त said...

धन्यवाद ..वन्दना जी, कुनाल जी, रविकर व सुषमा जी..और जनाब जमाल साहब ....

समय ही तो है ज़ालिम ऐसा फानी |
रह जाती है दुनिया ये आनी जानी |