मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Tuesday, May 12, 2015

"फासले इतने न अब पैदा करो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
हौसले के साथ में आगे बढ़ो
फासले इतने न अब पैदा करो।

जिन्दगी तो है हकीकत पर टिकी,
मत इसे जज्बात में रौंदा करो।

चाँद-तारों से भरी इस रात में,
उल्लुओं सी सोच मत रक्खा करो।

बुलबुलों से ज़िन्दगी की सीख लो,
राग अंधियारों का मत छेड़ा करो।

उलझनों का नाम ही है जिन्दगी,
हारकरथककर न यूँ बैठा करो।

छोड़कर शिकवें-गिलों की बात को,
मुल्क पर जानो-जिगर शैदा करो।

खूबसूरत दिल सजा हर जिस्म में,
 “रूप पर इतना न मत ऎंठा करो।

4 comments:

KAHKASHAN KHAN said...

शानदार रचना।

Madhulika Patel said...

बेहतरीन रचना ।

Madhulika Patel said...

बेहतरीन रचना ।

Madhulika Patel said...

बहुत बढ़िया रचना । मेरी ब्लॉग पर आप का स्वागत है ।