मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Tuesday, January 13, 2015

क़त्ल करने मुझे देखो , कब्र में घुस के बैठे हैं .



नहीं वे जानते मुझको,  दुश्मनी करके बैठे हैं ,
मेरे कुछ मिलने वाले भी,  उन्हीं से मिलके बैठे हैं ,
समझकर वे मुझे कायर,  बहुत खुश हो रहे नादाँ
क़त्ल करने मुझे देखो , कब्र में घुस के बैठे हैं .
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गिला वे कर रहे आकर , हमारे गुमसुम रहने का ,
गुलूबंद को जो कानों से , लपेटे अपने बैठे हैं .
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हमें गुस्ताख़ कहते हैं , गुनाह ऊँगली पे गिनवाएं ,
सवेरे से जो रातों तक , गालियाँ दे के बैठे हैं .
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नतीजा उनसे मिलने का , आज है सामने आया ,
पड़े हम जेल में आकर , वे घर हुक्का ले बैठे हैं .
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रखे जो रंजिशें दिल में , कभी न वो बदलता है ,
भले ही अपने होठों पर , तबस्सुम ले के बैठे है .
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नज़ीर ''शालिनी '' की ये , नज़रअंदाज़ मत करना ,
कहीं न कहना पड़ जाये , मियां तो लुट के बैठे हैं .
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शालिनी कौशिक
[कौशल ]

3 comments:

shikha kaushik said...

bahut khoob .wah

KAHKASHAN KHAN said...

बहुत ही सुंदर कविता प्रस्‍तुत की है आपने। धन्‍यवाद।

Gaddar Shayar said...

बहुत उम्दा लिखा हुआ है