मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Tuesday, July 1, 2014

उल्टे सीधे सपने पाले बैठे हैं -Shakeel Jamali

उल्टे सीधे सपने पाले बैठे हैं
सब पानी में काँटा डाले बैठे हैं
इक बीमार वसीयत करने वाला है
रिश्ते नाते जीभ निकाले बैठे हैं

बस्ती का मामूल पे आना मुश्किल है
चौराहे पर वर्दी वाले बैठे हैं

धागे पर लटकी है इज़्ज़त लोगों की
सब अपनी दस्तार सँभाले बैठे हैं

साहब-ज़ादा पिछली रात से ग़ायब है
घर के अंदर रिश्ते वाले बैठे हैं

आज शिकारी की झोली भर जाएगी
आज परिंदे गर्दन डाले बैठे हैं

4 comments:

Neetu Singhal said...

मुंसिफ है के मुंसिफ़ी की दुकाँ है..,
जम्हूरियत भी तोते पाले बैठे हैं.....

देवदत्त प्रसून said...

अच्छी रचना है !

shikha kaushik said...

behtareen ...

Prasanna Badan Chaturvedi said...

बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
नयी पोस्ट@जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ
रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनायें....