मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Friday, June 27, 2014

ये कौन बोल रहा है ख़ुदा के लहजे में...

कोई तो फूल खिलाए दुआ के लहजे में
अजब तरह की घुटन है हवा के लहजे में

ये वक़्त किस की रुऊनत पे ख़ाक डाल गया
ये कौन बोल रहा था ख़ुदा के लहजे में

न जाने ख़ल्क़-ए-ख़ुदा कौन से अज़ाब में है
हवाएँ चीख़ पड़ीं इल्तिजा के लहजे में

खुला फ़रेब-ए-मोहब्बत दिखाई देता है
अजब कमाल है उस बे-वफ़ा के लहजे में

यही है मसलहत-ए-जब्र-ए-एहतियात तो फिर
हम अपना हाल कहेंगे छुपा के लहजे में

{इफ़्तिख़ार आरिफ़}

6 comments:

Kunwar Kusumesh said...

good one

Neetu Singhal said...

अज़ब सी रंगीनियाँ रंगी है क़ैद ख़ानों ने..,
रिहाई की तहरीर है सज़ा के लहज़े में.....

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (28-06-2014) को "ये कौन बोल रहा है ख़ुदा के लहजे में... " (चर्चा मंच 1658) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

DR. ANWER JAMAL said...

shukriya.

आशा जोगळेकर said...


बहुत खूबसूरत लिखते हैं आप।

बस उसी का करम जहां में है हम पर
हर कोई बोल रहा है खुदा के लहजे में।

DR. ANWER JAMAL said...

आपका शेर उम्दा है।
शुक्रिया!