मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, May 15, 2014

मजदूर कभी नींद की गोली नही खाते

हसते हुए माँ-बाप की गाली नहीं खाते
बच्चे है तो क्यो शौक से मिट्ठी नहीं खाते

तुझ से नहीं मिलने का इरादा तो है लेकिन
तुझसे न मिलेंगे ये कसम  भीं नही खाते

सो जाते है फुटपाथ पे अखबार बिछाकर
मजदूर कभी नींद की गोली नही खाते

बच्चे भी गरीबी को समझने लगे शायद
अब जाग भी जाते है तो सहरी नहीं खाते

दावत तो बड़ी चीज़ है हम जैसे कलंदर
हर एक के पैसे की दवा भी नहीं खाते

अल्लाह गरीबो का मददगार है 'राना'
हम लोगो के बच्चे कभी सर्दी नहीं खाते - मुनव्वर राना 

शब्दार्थ :
सहरी = सूरज निकलने से पहले सुबह की अजान होने से पहले किय जाने वाला भोजन। 

Read more: http://www.jakhira.com/2014/05/haste-hue-maa-baap.html#ixzz31l9msUo3

4 comments:

राजेंद्र कुमार said...

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (16.05.2014) को "मित्र वही जो बने सहायक " (चर्चा अंक-1614)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

राजेंद्र कुमार said...
This comment has been removed by the author.
कविता रावत said...

सुन्दर रचना पढ़वाने के लिए धन्यवाद

Prasanna Badan Chaturvedi said...

बेहद उम्दा रचना और बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
नयी पोस्ट@आप की जब थी जरुरत आपने धोखा दिया (नई ऑडियो रिकार्डिंग)