मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, March 23, 2014

.....सियासत के काफिले .

हमको बुला रहे हैं सियासत के काफिले ,
सबको लुभा रहे हैं सियासत के काफिले .
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तशरीफ़ आवरी है घडी इंतखाब की,
दिल को भुना रहे हैं सियासत के काफिले .
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तसलीम कर रहे हैं हमें आज संभलकर ,
दुम को दबा रहे हैं सियासत के काफिले .
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न देते हैं मदद जो हमें फ़ाकाकशी में ,
घर को लुटा रहे हैं सियासत के काफिले .
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मख़मूर हुए फिरते हैं सत्ता में बैठकर ,
मुंह को धुला रहे हैं सियासत के काफिले .
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करते रहे फरेब हैं जो हमसे शबो-रोज़ ,
उनको छुपा रहे हैं सियासत के काफिले .
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फ़ह्माइश देती ''शालिनी'' अवाम समझ ले ,
तुमको घुमा रहे हैं सियासत के काफिले .
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शालिनी कौशिक
[कौशल ]
शब्दार्थ-तशरीफ़ आवरी-पधारना ,इंतखाब-चुनाव ,फाकाकशी-भूखो मरना ,मखमूर-नशे में चूर

8 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (24-03-2014) को लेख़न की अलग अलग विधाएँ (चर्चामंच-1561) में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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शहीदों को नमन के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत ख़ूब!

Digamber Naswa said...

सियासत के ये काफिले बहुत नुकसान कर जाते हैं जब जब आते हैं ...

हिमकर श्याम said...

वाह.. बहुत खूब... खूबसूरत अशआर…दिली दाद कुबूल करें…

shikha kaushik said...

bahut khoob .vah

Vaanbhatt said...

वाह-वाह...क्या बात है...

Shalini Kaushik said...

AAP SABHI KA HAUSLA AFZAAI KE LIYE SHUKRIYA .

DR. ANWER JAMAL said...

वाह.. बहुत खूब...