मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, June 27, 2013

बजरिये बख्शीश-ए-लोहा ,सोयी जनता जगायेंगे .


If Narendra Modi and Rahul Gandhi are all we get as options for prime minister, any other leader from the yet to be formed Third Front for the top job is not unwelcome at all. Neither the Congress-it\'s still cagey about its choice-nor the BJP-it has more or less decided on Modi-present us with a choice that is difficult to resist.

Neither Modi nor Rahul fit into the definition of a leader of a country with huge complexities. The latter is still discovering and making sense of India and the former firmly believes that India is an extension of Gujarat and all intricate problems confronting India, be it the area of economy or foreign affairs, render themselves to simplistic solutions. Both pretend to be outsiders impatient with the state of the polity. Both want to be the agent of the great change, but neither the powerful articulation of Modi nor the indecipherable silence of Rahul really tell us whether they are good enough for the task.
 Gandhinagar: Gujarat Chief Minister Narendra Modi today announced a nation-wide campaign to collect small pieces of iron from farmers for using it to build the proposed \'Statue of Unity\' in the memory of Sardar Vallabhbhai Patel.
 
On the day of Sardar Patel\'s birth anniversary on 31 October 2013, we will launch a nation-wide campaign, covering more than five lakh villages throughout the country to collect small pieces of iron of any tool used by farmers from each village, that will be used in the building the statue, Modi said in Gandhinagar before his inaugural address at the all India conference on livestock and dairy development 
बजरिये बख्शीश-ए-लोहा ,सोयी जनता जगायेंगे .
फिर एक नयी इबारत गढ़ ,साथ सबको ले आयेंगे .


भले ही दृढ इरादों ने ,उन्हें लौह-पुरुष बनाया था ,
ढालकर उनको मूरत में ,लोहा तो ये दिलवाएंगे .


मिटटी के लौंदे में लिपटे ,वे तो साधारण मानव थे .
महज़ लोहमय शख्सियत को ,लोहसार ये बनायेंगे .


मुखालिफ ने लगायी थी ,शहर में खुद की ही मूरत .
उसने खुद दम पर था खाया ,ये दूजे का खा जायेंगे .


उड़ायें ये मखौल उनके ,जो बनके लग गए हैं मूरत .
भला खुद बनवाये बुत की ,हंसी को रोक पाएंगे .


न खाने को हैं दो रोटी ,न तन ढकने को हैं कपडे .
ऐसे में इन इरादों से ,क्या जीवन ये दे पाएंगे .


फैलसूफी  में अपनी ये ,रहनुमा बनने आये हैं .
राहजनी खुलेआम करके ,उड़नछू ये हो जायेंगे .


रियाया अपनी समझकर ,रियायत ऐसे करते हैं .
साँस की एवज में लोहा ,ये सबसे लेकर जायेंगे .


बघंबर पहनकर आये ,असल में ये हैं सौदागर .
''शालिनी''ही नहीं इनको ,सभी पहचान जायेंगे .

शब्दार्थ:-बजरिये-के द्वारा ,बख्शीस-दान,लोहसार -फौलाद,इस्पात ,फैलसूफी-धूर्तता ,रियाया -प्रजा ,रियायत-मेहरबानी ,बघंबर-बाघ की खाल

   शालिनी कौशिक


Sunday, June 23, 2013

है जुदाई अगर उनकी किस्मत में ,बखुशी दूर जायेंगे हम भी .



Modi vs Nitish?

           मोदी और नीतीश

     कितने दूर कितने पास   


तोहमतें लगनी हों तो लगती रहें ,तुनक मिज़ाजी दिखाएंगें हम भी .
है जुदाई अगर उनकी किस्मत में ,बखुशी दूर जायेंगे हम भी .



हम न करते हैं बात मज़हब की ,अपने ख्वाबों में महज़ कुर्सी है .
अपना हीरा क़ुबूल उनको नहीं ,उनके सौदे से दूर हैं हम भी .


बात बिगड़ी थी अभी थोड़ी सी ,धीरे धीरे संभल ही जाएगी .
बात मानी अगर यूँ गैरों की ,क्या पता दूर जा गिरें हम भी .


बगावत नहीं हैं कर सकते ,हमारी भी है मजबूरी .
नहीं मुहं खोलेंगे अपना ,कसम अब खाते हैं हम भी .


सियासत करनी है हमको ,नहीं थियेटर चलाना है .
बिताने को जहाँ दो पल ,देख कुछ लेते थे हम भी .


आज जिसकी रेटिंग ज्यादा ,सभी उसके पीछे भागें .
लगाकर पूरे दम ख़म को ,भागते फिर रहे हम भी .


''शालिनी''की नहीं केवल ,ये पूरे भारत की मंशा .
मगरमच्छ कितने पानी में ,संग सबके देखें हम भी .


शब्दार्थ :तुनक मिज़ाजी-चिडचिडापन ,बखुशी-प्रसन्नतापूर्वक .

शालिनी कौशिक 



     

Monday, June 17, 2013

रुखसार-ए-सत्ता ने तुम्हें बीमार किया है .



 ये राहें तुम्हें कभी तन्हा न मिलेंगीं ,
तुमने इन्हें फरेबों से गुलज़ार किया है .


ताजिंदगी करते रहे हम खिदमतें जिनकी ,
फरफंद से अपने हमें बेजार किया है .


कायम थी सल्तनत कभी इस घर में हमारी ,

मुख़्तार बना तुमको खुद लाचार किया है .


करते कभी खुशामदें तुम बैठ हमारी ,
हमने ही तुम्हें सिर पे यूँ सवार किया है .


एहसान फरामोश नहीं हम तेरे जैसे ,

बनेंगे हमसफ़र तेरे इकरार किया है .


गुर्ग आशनाई से भरे भले रहें हो संग ,
रुखसार-ए-सत्ता ने तुम्हें बीमार किया है .


फबती उड़ाए ''शालिनी''करतूतों पर इनकी ,
हमदर्दों को मुखौटों ने बेकार किया है .

शब्दार्थ ;गुलज़ार-चहल-पहल वाला ,ताजिंदगी-आजीवन ,गुर्ग आशनाई   -कपटपूर्ण मित्रता ,फबती उड़ाए -चुटकी लेना .

शालिनी कौशिक 

      [कौशल]