मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, February 28, 2013

"हमीं पर वार करते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी एक पुरानी ग़ज़ल

हमारा ही नमक खाते, हमीं पर वार करते हैं।
जहर मॆं बुझाकर खंजर, जिगर के पार करते हैं।।

शराफत ये हमारी है, कि हम बर्दाश्त करते हैं,
नहीं वो समझते हैं ये, उन्हें हम प्यार करते हैं।

हमारी आग में तपकर, कभी पिघलेंगे पत्थर भी,
पहाड़ों के शहर में हम, चमन गुलज़ार करते हैं।

कहीं हैं बर्फ के जंगल, कहीं ज्वालामुखी भी हैं,
कभी रंज-ओ-अलम का हम, नहीं इज़हार करते हैं।

अकीदा है, छिपा होगा कोई भगवान पत्थर में,
इसी उम्मीद में हम, रोज ही बेगार करते हैं।

नहीं है रूप से मतलब, नहीं है रंग की चिन्ता,
तराशा है जिसे रब ने, उसे स्वीकार करते हैं।

Wednesday, February 27, 2013

"बदल जाते तो अच्छा था" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



समय के साथ में हम भी, बदल जाते तो अच्छा था।
घनी ज़ुल्फों के साये में, ग़ज़ल गाते तो अच्छा था।

सदाएँ दे रहे थे वो, अदाओं से लुभाते थे,
चटकती शोख़ कलियों पर, मचल जाते तो अच्छा था।

पुरातनपंथिया अपनी, बनी थीं राह का रोड़ा,
नये से रास्तों पर हम, निकल जाते तो अच्छा था।

मगर बन गोश्त का हलवा, हमें खाना नहीं आया,
सलीके से गरीबों को, निगल जाते तो अच्छा था।

मिली सौहबत पहाड़ों की, हमारा दिल हुआ पत्थर,
तपिश से प्रीत की हम भी, पिघल जाते तो अच्छा था।

जमा था रूप का पानी, हमारे घर के आँगन में,
सुहाने घाट पर हम भी, फिसल जाते तो अच्छा था।

Sunday, February 24, 2013

अकलमंद ऐसे दुनिया में तबाही करते हैं .

 Expressive criminal -Funny Male Business Criminal Laughing -

तबस्सुम चेहरे पर लाकर हलाक़ करते हैं ,
अकलमंद ऐसे दुनिया में तबाही करते हैं .


बरकंदाज़ी करते ये फरीकबंदी की ,
इबादत गैरों की अपनों से फरक करते हैं .


फ़रेफ्ता अपना ही होना फलसफा इनके जीवन का ,
फर्जी फरजानगी की शख्सियत ये रखते हैं .


मुनहसिर जिस सियासत के मुश्तरक उसमे सब हो लें ,
यूँ ही मौके-बेमौके फसाद करते हैं .


समझते खुद को फरज़ाना मुकाबिल हैं न ये उनके,
जो अँधेरे में भी भेदों पे नज़र रखते हैं .


तखैयुल पहले करते हैं शिकार करते बाद में ,
गुप्तचर मुजरिम को कुछ यूँ तलाश करते हैं .

हुआ जो सावन में अँधा दिखे है सब हरा उसको ,
ऐसे रोगी जहाँ में क्यूं यूँ खुले फिरते हैं .


 रश्क अपनों से रखते ये वफ़ादारी करें उनकी ,
मिटाने को जो मानवता उडान भरते हैं .

हकीकत कहने से पीछे कभी न हटती ''शालिनी''
मौजूं  हालात आकर उसमे ये दम भरते हैं .


शब्दार्थ-तखैयुल -कल्पना ,फसाद-लड़ाई-झगडा ,फरज़ाना -बुद्धिमान ,मुनहसिर-आश्रित ,बरकंदाज़ी -चौकीदारी ,रश्क-जलन ,फरक-भेदभाव .

शालिनी कौशिक
       [कौशल ]

सरकार चल रही है जुगाड़ से


जुगाड़ सिस्टम

एक अमेरिकी निकला, भारत के सफ़र पर
पर भीड़ भाड़ के कारण , न मिला होटल में अवसर
न जाने कितने होटलों के लगा चुका था, चक्कर
पर हर जगह उसे निराश मिली, हाउसफुल पढ़कर
एक आदमी मिला, बोला मिल जायेगा रूम, तुम्हे जुगाड़ पर
बस इसके लिए तुम्हे खर्च करने होंगे , कुछ और डालर
व्हाट इज़ जुगाड़ ? इससे कैसे मिलेगा रूम
दिस इज इंडियन सिस्टम, बस तू ख़ुशी से झूम
इस तरह आदमी ने अमेरिकी को दिलाई राहत
पर वो हैरान देख के जुगाड़ की जगमगाहट
उस आदमी ने अमेरिकी को जुगाड़ से दिलाया वापिसी टिकट
पर इस जुगाड़ सिस्टम से था , एक प्रश्न विकट
पहुचते ही अमेरिका, उसने प्रेसिडेंट से संपर्क साधा
इंडिया से जल्द मांगो जुगाड़ सिस्टम, जो दूर करे हर बाधा
अमेरिकी प्रेसिडेंट ने फ़ोन लगाया, तुरत इंडियन प्राइम मिनिस्टर को
बोले क्या है ये जुगाड़ सिस्टम, जो दीवाना बनाये इस मिस्टर को
जल्द से जल्द आप हमें ये जुगाड़ सिस्टम एक्सपोर्ट कीजिये
सॉरी हम मजबूर हैं, इस बार हमें बख्श दीजिये
पहली बार हमें आपको मनाही करनी पड़ रही है
बस इसी सिस्टम से ही तो, हमारी सरकार चल रही है

जुगाड़ सिस्टम 

एक अमेरिकी निकला, भारत के सफ़र पर
पर भीड़ भाड़ के कारण , न मिला होटल में अवसर
न जाने कितने होटलों के लगा चुका था, चक्कर
पर हर जगह उसे निराश मिली, हाउसफुल पढ़कर
एक आदमी मिला, बोला मिल जायेगा रूम, तुम्हे जुगाड़ पर
बस इसके लिए तुम्हे खर्च करने होंगे , कुछ और डालर
व्हाट इज जुगाड़ ? इससे कैसे मिलेगा रूम
दिस इज इंडियन सिस्टम, बस तू ख़ुशी से झूम
इस तरह आदमी ने अमेरिकी को दिलाई राहत
पर वो हैरान देख के जुगाड़ की जगमगाहट
उस आदमी ने अमेरिकी को जुगाड़ से दिलाया वापिसी टिकट
पर इस जुगाड़ सिस्टम से था , एक प्रश्न विकट
पहुचते ही अमेरिका, उसने प्रेसिडेंट से संपर्क साधा
इंडिया से जल्द मांगो जुगाड़ सिस्टम, जो दूर करे हर बाधा
अमेरिकी प्रेसिडेंट ने फोम लगाया, तुरत इंडियन प्राइम मिनिस्टर को
बोले क्या है ये जुगाड़ सिस्टम, जो दीवाना बनाये इस मिस्टर को
जल्द से जल्द आप हमें ये जुगाड़ सिस्टम एक्सपोर्ट कीजिये
सॉरी हम मजबूर है, इस बार हमें बक्श दीजिये
पहली बार हमें आपको मनाही करनी पड़ रही है
बस इसी सिस्टम से ही तो, हमारी सरकार चल रही है

Saturday, February 23, 2013

इस बार भी बस ग़रीब ही पिसेगा


इस बार भी बस ग़रीब ही पिसेगा !
उसी का ख़ून पानी है वही बहेगा !!

Friday, February 22, 2013

कलेजे में वतन का इश्क भर दे .


 Kashmiri : SRINAGAR, INDIA - JULY 11, 2009: A taxi boatman paddles through the sellers of the floating market, a major tourist attraction on Dal Lake on July 11, 2009 in Srinagar, IndiaKashmiri : SRINAGAR, INDIA - JULY 11, 2009: A Kashmiri man rows by the remainder of the morning floating market on Dal Lake, a major tourist attraction, in Kashmir on July 11, 2009 in Srinagar, India

या खुदा नादानी इनकी दूर कर दे ,
शहादत-ए-बारीकी से दो -चार कर दे .

शहीद कहते हैं किसको नहीं इनको खबर है ,
वही जो मुल्क की खातिर ये जां कुर्बान कर दे .

शहादत देना क्या जाने ऐसा फरेबी ,
परवरिश करने वाले का ही देखो क़त्ल कर दे .

खुदा की राह में बलिदान पाता वह कदर है ,
फ़ना खुद को जो खातिर दूसरों की कर दे .


न केवल नाम से अफज़ल बनो कश्मीर वालों ,
दिखाओ हिन्द के बनकर ,जो इसमें असर दे .

खुदा का शुक्र मनाओ मिले तुम हिन्द में आकर ,
होगे नाशाद तुम्हीं गर ये तुम्हे बाहर ही कर दे .

दुआ मांगूं खुदा से लाये इनको रास्ते पर ,
सही आज़ादी की इनमे थोड़ी अक्ल भर दे .


हुकूमत कर रहा मज़हब इनके दिलों पर ,
कलेजे में वतन का इश्क भर दे .

जियें ये देश की खातिर मरें ये मुल्क पर अपने ,
धडकनें रूहों में इनकी इसी कुदरत की भर दे .

सफल समझेगी ''शालिनी''सभी प्रयास ये अपने ,
वतन से प्रेम की शमां अगर रोशन वो कर दे .


शब्दार्थ -बारीकी-सूक्ष्मता ,अफज़ल-श्रेष्ठ ,नाशाद-बदनसीब ,

      शालिनी कौशिक
                [कौशल ]



Wednesday, February 6, 2013

"प्यार से बोला करो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


तुम कभी तो प्यार से बोला करो।
राज़ दिल के तो कभी खोला करो।।

हम तुम्हारे वास्ते घर आये हैं,
मत तराजू में हमें तोला करो।

ज़र नहीं है पास अपने तो जिगर है,
चाशनी में ज़हर मत घोला करो।

डोर नाज़ुक है उड़ो मत फ़लक में,
पेण्डुलम की तरह मत डोला करो।

राख में सोई हैं कुछ चिंगारियाँ,
मत हवा देकर इन्हें शोला करो।

आँख से देखो-सराहो दूर से,
रूप को छूकर नहीं मैला करो।