मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Saturday, November 2, 2013

यूँ इक सबक़-ए-महर-ओ-वफ़ा छोड़ गए हम

यूँ इक सबक़-ए-महर-ओ-वफ़ा छोड़ गए हम
हर राह में नक़्श-ए-कफ़-ए-पा छोड़ गए हम

दुनिया तेरे क़िर्तास पे क्या छोड़ गए हम
इक हुस्न-ए-बयाँ हुस्न-ए-अदा छोड़ गए हम

माहौल की ज़ुल्मात में जिस राह से गुज़रे
क़िंदील-ए-मोहब्बत की ज़िया छोड़ गए हम

बेगाना रहे दर्द-ए-मोहब्बत की दवा से
ये दर्द ही कुछ और सिवा छोड़ गए हम

थी सामने आलाइश-ए-दुनिया की भी इक राह
वो ख़ूबी-ए-क़िस्मत से ज़रा छोड़ गए हम

इक हुस्न-ए-दकन था के निगाहों से न छूटा
हर हुस्न को वरना बा-ख़ुदा छोड़ गए हम

रचनाकार: जगन्नाथ आज़ाद

8 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपको और आपके पूरे परिवार को दीपावली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।
स्वस्थ रहो।
प्रसन्न रहो हमेशा।

Tushar Raj Rastogi said...

बहुत खूब

Kunwar Kusumesh said...

दीपपर्व सभी के लिये मंगलमय हो ……

रविकर said...

पाव पाव दीपावली, शुभकामना अनेक |
वली-वलीमुख अवध में, सबके प्रभु तो एक |
सब के प्रभु तो एक, उन्हीं का चलता सिक्का |
कई पावली किन्तु, स्वयं को कहते इक्का |
जाओ उनसे चेत, बनो मत मूर्ख गावदी |
रविकर दिया सँदेश, मिठाई पाव पाव दी ||


वली-वलीमुख = राम जी / हनुमान जी
पावली=चवन्नी
गावदी = मूर्ख / अबोध

Neetu Singhal said...

फिर इक जश्ने-रोज़ गरोब-ओ-गुरबत में जी लिए..,
इक प्यादा एक घोड़ा इक बादशाह छोड़ गए हम.....

Neetu Singhal said...

फिर इक जश्ने-रोज़ ग़रीब गर्दो-गुरबत में जी लिए..,
इक प्यादा एक घोड़ा इक बादशाह छोड़ गए हम.…

DR. ANWER JAMAL said...

सबका शुक्रिया शुभकामनाओं के लिये.

प्रेम सरोवर said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति। मेरे नए पोस्ट "समय की भी उम्र होती है",पर आपका इंतजार रहेगा। धन्यवाद।