मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Saturday, August 10, 2013

तमन्नाओं के बाज़ार में

तमन्नाओं के बाज़ार में
दुकानें तो बहुत सजाई मैंने
मगर खरीददार नहीं आया कोई
जो भी आया बेचैनी बेच गया 
बदले में सुकून ले गया
पहले ही मुफलिस-ऐ -सुकून था
अब पूरी तरह मुफलिस हो गया

मुफलिस,तमन्ना,मुफलिस--सुकून,सुकून
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

3 comments:

Minakshi Pant said...

Waah waah bahut khub ...

DR. ANWER JAMAL said...

nice.

yashoda agrawal said...

अत्यन्त हर्ष के साथ सूचित कर रही हूँ कि
आपकी इस बेहतरीन रचना की चर्चा शुक्रवार 16-08-2013 के .....बेईमान काटते हैं चाँदी:चर्चा मंच 1338 ....शुक्रवारीय अंक.... पर भी होगी!
सादर...!