मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Monday, June 17, 2013

रुखसार-ए-सत्ता ने तुम्हें बीमार किया है .



 ये राहें तुम्हें कभी तन्हा न मिलेंगीं ,
तुमने इन्हें फरेबों से गुलज़ार किया है .


ताजिंदगी करते रहे हम खिदमतें जिनकी ,
फरफंद से अपने हमें बेजार किया है .


कायम थी सल्तनत कभी इस घर में हमारी ,

मुख़्तार बना तुमको खुद लाचार किया है .


करते कभी खुशामदें तुम बैठ हमारी ,
हमने ही तुम्हें सिर पे यूँ सवार किया है .


एहसान फरामोश नहीं हम तेरे जैसे ,

बनेंगे हमसफ़र तेरे इकरार किया है .


गुर्ग आशनाई से भरे भले रहें हो संग ,
रुखसार-ए-सत्ता ने तुम्हें बीमार किया है .


फबती उड़ाए ''शालिनी''करतूतों पर इनकी ,
हमदर्दों को मुखौटों ने बेकार किया है .

शब्दार्थ ;गुलज़ार-चहल-पहल वाला ,ताजिंदगी-आजीवन ,गुर्ग आशनाई   -कपटपूर्ण मित्रता ,फबती उड़ाए -चुटकी लेना .

शालिनी कौशिक 

      [कौशल]


3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (17-06-2013) पिता दिवस पर गुज़ारिश : चर्चामंच 1278 में "मयंक का कोना" पर भी है!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सरिता भाटिया said...

वाह बहुत खुबसूरत गजल शालिनी जी बधाई

अरुन शर्मा 'अनन्त' said...

आपकी यह रचना कल मंगलवार (18 -06-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.