मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, May 23, 2013

मिला जिससे हमें जीवन उसे एक दिन में बंधवाती .




सम्मानित ब्लोगर्स 

     नमस्कार 
आप सभी से सादर अनुरोध है की आपको मेरी इस ग़ज़ल में जो भी त्रुटि एक ग़ज़ल के हिसाब से दिखें आप सभी उसका सुधार मुझे यहीं बताएं .मैं आप सभी की आभारी रहूंगी .कृपया बताएं  अवश्य .
                                       शालिनी कौशिक 



Mother : illustration of mother embracing child in Mother s Day Card Stock Photo 

तरक्की इस जहाँ में है तमाशे खूब करवाती ,
मिला जिससे हमें जीवन उसे एक दिन में बंधवाती .

महीनों गर्भ में रखती ,जनम दे करती रखवाली ,
उसे औलाद के हाथों है कुछ सौगात दिलवाती .

सिरहाने बैठ माँ के एक पल भी दे नहीं सकते ,
दिखावे में उन्हीं से होटलों में मंच सजवाती .


कहे माँ लाने को ऐनक ,नहीं दिखता बिना उसके ,
कुबेरों के खजाने में ठन-गोपाल बजवाती .

बढ़ाये आगे जीवन में दिलाती कामयाबी है ,
उसी मैय्या को औलादें, हैं रोटी को भी तरसाती .

महज एक दिन की चांदनी ,न चाहत है किसी माँ की ,
मुबारक उसका हर पल तब ,दिखे औलाद मुस्काती .

याद करना ढूंढकर दिन ,सभ्यता नहीं हमारी है ,
हमारी मर्यादा ही रोज़ माँ के पैर पुजवाती .


किया जाता याद उनको जिन्हें हम भूल जाते हैं ,
है धड़कन माँ ही जब अपनी कहाँ है उसकी सुध जाती .

वजूद माँ से है अपना ,शरीर क्या बिना उसके ,
उसी की सांसों की ज्वाला हमारा जीवन चलवाती .


शब्दों में नहीं बंधती ,भावों में नहीं बहती ,
कड़क चट्टान की मानिंद हौसले हममे भर जाती .

करे कुर्बान खुद को माँ,सदा औलाद की खातिर ,
क्या चौबीस घंटे में एक पल भी माँ है भारी पड़ जाती .



मनाओ इस दिवस को तुम उमंग उत्साह से भरकर ,
बाद इसके किसी भी दिन क्या माँ है याद फिर आती .

बाँटो ''शालिनी''के संग रोज़ गम ख़ुशी माँ के,
 फिर ऐसे पाखंडों को ढोने की नौबत नहीं आती .

              शालिनी कौशिक 
                       [कौशल]





6 comments:

Abhimanyu Bhardwaj said...

बहुत सुन्‍दर गजल है, और मुझे तो कमी नजर नहीं आयी है
हिन्‍दी तकनीकी क्षेत्र की जादूई जानकारियॉ प्राप्‍त करने के लिये एक बार अवश्‍य पधारें और टिप्‍पणी के रूप में मार्गदर्शन प्रदान करने के साथ साथ पर अनुसरण कर अनुग्रहित करें MY BIG GUIDE

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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शुक्रवार (24-05-2013) के गर्मी अपने पूरे यौवन पर है...चर्चा मंच-अंकः१२५४ पर भी होगी!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

ब्लॉग प्रसारण said...

आपकी यह रचना आज शनिवार (25 -05-2013) को ब्लॉग प्रसारण पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

shikha kaushik said...

aap open book par jayen vahan bade bade vidwan hain .aapko gazal ki abcd sikha hi dengen .

Dr.NISHA MAHARANA said...

bahut badhiya ...wastvikta se bharpoor ....

मदन मोहन सक्सेना said...

बहुत खूब