मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Friday, March 1, 2013

हम वफ़ा कर रहे हैं उनकी जफ़ाओं के बाद भी -Dr. Anwer Jamal

बाक़ी हैं कुछ सज़ाएं सज़ाओं के बाद भी
हम वफ़ा कर रहे हैं उनकी जफ़ाओं के बाद भी

हमें अपने वुजूद से लड़ने का शौक़ है
हम जल रहे हैं तेज़ हवाओं के बाद भी

करता है मेरे अज़्म की मौसम मुख़ालिफ़त
धरती पे धूप आई घटाओं के बाद भी

मौत खुद आके उसकी मसीहाई कर गई
बच न पाया मरीज़ दवाओं के बाद भी

लहजे पे था भरोसा , न लफ़्ज़ों पे था यक़ीं
दिल मुतमईं हो कैसे दुआओं के बाद भी

मुन्सिफ़ से जाके पूछ लो ‘अनवर‘ ये राज़ भी
वो बेख़ता है कैसे ख़ताओं के बाद भी

शब्दार्थ : जफ़ा - बेवफ़ाई , अज़्म - इरादा , मुन्सिफ़ - इन्साफ़ करने वाला


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यह हमारी एक पुरानी ग़ज़ल है। इस ग़ज़ल के साथ कुछ दूसरी तफ़्सीलात भी हैं, जिन्हें आप हमारी निम्न पोस्ट पर देख सकते हैं-

4 comments:

रविकर said...

nice-

Aditi Poonam said...

खूबसूरत गजल

शालिनी कौशिक said...

मुन्सिफ़ से जाके पूछ लो ‘अनवर‘ ये राज़ भी
वो बेख़ता है कैसे ख़ताओं के बाद भी
जैसे को तैसा .शानदार
.बहुत सुन्दर भावनात्मक प्रस्तुति लिए आभार छोटी मोटी मांगे न कर , अब राज्य इसे बनवाएँगे .” आप भी जानें हमारे संविधान के अनुसार कैग [विनोद राय] मुख्य निर्वाचन आयुक्त [टी.एन.शेषन] नहीं हो सकते

डॉ शिखा कौशिक ''नूतन '' said...

ग़ज़ल सुन्दर है और सब ठीक -ठाक है .