मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, February 28, 2013

"हमीं पर वार करते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी एक पुरानी ग़ज़ल

हमारा ही नमक खाते, हमीं पर वार करते हैं।
जहर मॆं बुझाकर खंजर, जिगर के पार करते हैं।।

शराफत ये हमारी है, कि हम बर्दाश्त करते हैं,
नहीं वो समझते हैं ये, उन्हें हम प्यार करते हैं।

हमारी आग में तपकर, कभी पिघलेंगे पत्थर भी,
पहाड़ों के शहर में हम, चमन गुलज़ार करते हैं।

कहीं हैं बर्फ के जंगल, कहीं ज्वालामुखी भी हैं,
कभी रंज-ओ-अलम का हम, नहीं इज़हार करते हैं।

अकीदा है, छिपा होगा कोई भगवान पत्थर में,
इसी उम्मीद में हम, रोज ही बेगार करते हैं।

नहीं है रूप से मतलब, नहीं है रंग की चिन्ता,
तराशा है जिसे रब ने, उसे स्वीकार करते हैं।

9 comments:

Rajendra Kumar said...

हमारा ही नमक खाते, हमीं पर वार करते हैं।
जहर मॆं बुझाकर खंजर, जिगर के पार करते हैं।।
बहुत ही सार्थक शब्दों से रची है सुन्दर ग़ज़ल,धन्यवाद.

Aziz Jaunpuri said...

ओल्ड इस गोल्ड की कहावत चरितार्थ करती ग़ज़ल ,एक
मुकम्मल ग़ज़ल ,

रविकर said...

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवारीय चर्चा मंच पर ।।

शालिनी कौशिक said...

हमारा ही नमक खाते, हमीं पर वार करते हैं।
जहर मॆं बुझाकर खंजर, जिगर के पार करते हैं।।

.बिल्कुल सही कहा है आपने . .रोचक प्रस्तुति जबरदस्त कटाक्ष .आभार क्या हैदराबाद आतंकी हमला भारत की पक्षपात भरी नीति का परिणाम है ?नहीं ये ईर्ष्या की कार्यवाही . आप भी जानें हमारे संविधान के अनुसार कैग [विनोद राय] मुख्य निर्वाचन आयुक्त [टी.एन.शेषन] नहीं हो सकते

Madan Mohan Saxena said...

बेह्तरीन अभिव्यक्ति .शुभकामनायें.

Virendra Kumar Sharma said...

बहुत सुन्दर रचना है सर .लेकिन कुत्ते की पूंछ ........

डॉ शिखा कौशिक ''नूतन '' said...

एक एक शब्द ह्रदय की व्यथा को संप्रेषित कर रहा है .सादर

डॉ शिखा कौशिक ''नूतन '' said...

@वीरू भाई -माननीय ''यह कुत्ते की पूँछ...'' भी हमारे आदरणीय ब्लोगर हैं .अभिजात्य वर्ग के दंभ से बाहर आइये .

सरिता भाटिया said...

waah kya baat hai guru ji
laazwaab