मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Wednesday, February 27, 2013

"बदल जाते तो अच्छा था" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



समय के साथ में हम भी, बदल जाते तो अच्छा था।
घनी ज़ुल्फों के साये में, ग़ज़ल गाते तो अच्छा था।

सदाएँ दे रहे थे वो, अदाओं से लुभाते थे,
चटकती शोख़ कलियों पर, मचल जाते तो अच्छा था।

पुरातनपंथिया अपनी, बनी थीं राह का रोड़ा,
नये से रास्तों पर हम, निकल जाते तो अच्छा था।

मगर बन गोश्त का हलवा, हमें खाना नहीं आया,
सलीके से गरीबों को, निगल जाते तो अच्छा था।

मिली सौहबत पहाड़ों की, हमारा दिल हुआ पत्थर,
तपिश से प्रीत की हम भी, पिघल जाते तो अच्छा था।

जमा था रूप का पानी, हमारे घर के आँगन में,
सुहाने घाट पर हम भी, फिसल जाते तो अच्छा था।

8 comments:

शालिनी कौशिक said...

पुरातनपंथिया अपनी, बनी थीं राह का रोड़ा,
नये से रास्तों पर हम, निकल जाते तो अच्छा था।
.बहुत सुन्दर भावनात्मक प्रस्तुति .आभार क्या हैदराबाद आतंकी हमला भारत की पक्षपात भरी नीति का परिणाम है ?नहीं ये ईर्ष्या की कार्यवाही . आप भी जानें हमारे संविधान के अनुसार कैग [विनोद राय] मुख्य निर्वाचन आयुक्त [टी.एन.शेषन] नहीं हो सकते

yashoda agrawal said...

आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 02/03/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

रविकर said...

ऐसे ही ठीक हैं न गुरुवर-

क्यों बदलना -

किसके लिए बदलना -



बहुत खूब-

आभार आपका -

Dr.NISHA MAHARANA said...

मिली सौहबत पहाड़ों की, हमारा दिल हुआ पत्थर,
तपिश से प्रीत की हम भी, पिघल जाते तो अच्छा था।bahut badhiya ...

Rajendra Kumar said...

बहुत ही शानदार है आज का मुशायरा,आभार.

DR. ANWER JAMAL said...

सदाएँ दे रहे थे वो, अदाओं से लुभाते थे,
चटकती शोख़ कलियों पर, मचल जाते तो अच्छा था।

बहुत ख़ूब !

Aziz Jaunpuri said...

sir ji,gazal padh kar aanand aa gya,bahut hi sundar gazal "BHATAKT KAR THAK GAYE AB HAM,YAHI AAJATI TO ACCHHA THA,TUMHARI ZULF KE SAYE ME DIN GUZAR JATRTO ACCHA THA,,,,"

Aditi Poonam said...

बेहतरीन......वाह!!!!!!