मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Monday, January 7, 2013

राम के भक्त कहाँ, बन्दा-ए- रहमान कहाँ

फेसबुक से साभार -






राम के भक्त कहाँ, बन्दा-ए- रहमान कहाँ
तू भी हिंदू है कहाँ, मैं भी मुसलमान कहाँ

तेरे हाथों में भी त्रिशूल है गीता की जगह
मेरे हाथों में भी तलवार है कुरआन कहाँ

तू मुझे दोष दे, मैं तुझ पे लगाऊँ इलज़ाम
ऐसे आलम में भला अम्न का इम्कान कहाँ


आज तो मन्दिरो मस्जिद में लहू बहता है
पानीपत और पलासी के वो मैदान कहाँ


कर्फ्यू शहर में आसानी से लग सकता है
सर छुपा लेने को फुटपाथ पे इंसान कहाँ


किसी मस्जिद का है गुम्बद, के कलश मन्दिर का
इक थके-हारे परिंदे को ये पहचान कहाँ


पहले इस मुल्क के बच्चों को खिलाओ खाना
फिर बताना उन्हें पैदा हुए भगवान कहाँ


13 comments:

Rohitas ghorela said...

waah waah ... kya baat hai :)

रविकर said...

शब्द शब्द अंगार है, धारदार हथियार |
नहीं दुश्मनी से भला, मित्र बांटिये प्यार |
मित्र बांटिये प्यार, भूख इक सी ही होवे |
बच्चों को अधिकार, कभी नहिं दुःख से रोवे |
अपना अपना धर्म, नियम से अगर निभाओ |
हर बन्दे में ईश, सामने दर्शन पाओ ||

रविकर said...

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति मंगलवार के चर्चा मंच पर ।।

शालिनी कौशिक said...

बहुत सार्थक भावनात्मक अभिव्यक्ति हार्दिक आभार @मोहन भागवत जी-अब और बंटवारा नहीं

nilesh mathur said...

वाह! क्या बात है, बहुत खूब।

DR. ANWER JAMAL said...

@ Ravikar ji ! waah .
bahut badhiya janab.

yashoda agrawal said...

आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 09/01/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

Asha Saxena said...

शब्द स्जब्द अंगार है धार दार हतियार
बहुत भावपूर्ण अभिव्यक्ति |
आशा

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

भक्तों के व्यवहार पर, रब भी है हैरान।
इंसानों के भेष में, घूम रहे शैतान।।

Virendra Kumar Sharma said...

सशक्त अभिव्यक्ति हुई है सार की, अर्थविस्तार की ,विचार की .बढ़िया सर्वकालिक रचना .बधाई भाई जान .

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत ख़ूब वाह!

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत ख़ूब वाह!

Prakash Jain said...

bahut khoob