मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Tuesday, August 28, 2012

दायरा दर दायरा बस दर्द है Gazal


ग़ज़ल

दायरा दर दायरा बस दर्द है
दश्ते दिल है बेबसी की गर्द है

आग इक सुलगी हुई है कर्ब की
सांस लेती हूं तो आहे सर्द है

नख्ले जां को ख़ूं पिलाया उम्र भर
शाख़े हस्ती आज भी जाने क्यूं ज़र्द है

खोजने निकली मैं अपने आप को
मैंने देखा लापता हर फ़र्द है

किस तरह ‘आशी‘ सुकूं मिलता मुझे
सोच का हर पहर ही बेदर्द है

शब्दार्थः
दश्ते दिल - दिल का जंगल, गर्द-धूल,
कर्ब-कष्ट, नख्ले जां-वुजूद का बाग़,
ज़र्द-पीला, फ़र्द-व्यक्ति, सुकूं अर्थात सुकून-शांति

Sunday, August 26, 2012

तुम मुझको क्या दे पाओगे?


तुम मुझको क्या दे पाओगे?


Women Revolutionaries
google se sabhar
तुम भूले सीता सावित्री ,क्या याद मुझे रख पाओगे ,
खुद तहीदस्त हो इस जग में तुम मुझको क्या दे पाओगे?

मेरे हाथों में पल बढ़कर इस देह को तुमने धारा है ,
मन में सोचो क्या ये ताक़त ताजिंदगी भी तुम पाओगे ?

संग चलकर बनकर हमसफ़र हर मोड़ पे साथ निभाया है ,
क्या रख गुरूर से दूरी तुम ताज़ीम मुझे दे पाओगे ?

कनीज़ समझ औरत को तुम खिदमत को फ़र्ज़ बताते हो,
उस शबो-रोज़ क़ुरबानी का क्या क़र्ज़ अदा कर पाओगे?

फ़ितरत ये औरत की ही है दे देती माफ़ी बार बार ,
क्या उसकी इस इनायत का इकबाल कभी कर पाओगे?

शहकार है नारी खिलक़त की ''शालिनी ''झुककर करे सलाम ,
इजमालन सुनलो इबरत ये कि खाक भी न कर पाओगे.


शब्दार्थ :तहीदस्त-खाली हाथ ,इनायत- कृपा ,ताजिंदगी -आजीवन 
ताज़ीम -दूसरे को बड़ा समझना ,आदर भाव ,सलाम 
कनीज़ -दासी ,इजमालन -संक्षेप में ,इबरत -चेतावनी ,
इकबाल -कबूल करना ,शहकार -सर्वोत्कृष्ट कृति ,
खिलक़त-सृष्टि 
      
                    शालिनी कौशिक 
                                  [कौशल ]

जब भी चाहें एक नई सूरत बना लेते हैं लोग -Qateel

फेसबुक पर 
जब भी चाहें एक नई सूरत बना लेते हैं लोग
एक चेहरे पर कई चेहरे सजा लेते हैं लोग

मिल भी लेते हैं गले से अपने मतलब के लिए
आ पड़े मुश्किल तो नज़रें भी चुरा लेते हैं लोग

है बजा उनकी शिकायत लेकिन इसका क्या इलाज
बिजलियाँ ख़ुद अपने गुलशन पर गिरा लेते हैं लोग

हो ख़ुशी भी उनको हासिल ये ज़रूरी तो नहीं
  ग़म छुपाने के लिए भी मुस्कुरा लेते हैं लोग

ये भी देखा है कि जब आ जाये ग़ैरत का मक़ाम
अपनी सूली अपने काँधे पर उठा लेते हैं लोग 

Tuesday, August 21, 2012

अपने क़लम के लिए लिखो Nice Hindi Poem

प्रिय
ऐसे में आखिर लिखे अब क्यों कोई, क्या आप बतलाओगे मुझे ?

क्या लिखना ?
किसके लिए लिखना ?
अक्सर ऐसे सवाल झिंझोड़ते हैं मन को
सही है , मगर
हर शै वक्फ़ है
अपने मक़सद के लिए
दिमाग़ सोचने के लिए
दिल मानने के लिए
ज़ुबां बोलने के लिए
और क़लम लिखने के लिए
न लिखा जाएगा तो
मर जाएगा क़लम
मर जाएगा दिल ओ दिमाग़
और मर जाएगी ज़ुबां भी
मर जाएगी सोच और
मर जाएगी इंसानियत भी
इंसानियत को बचाना है तो
बचाना होगा ख़ुद को
बचाना होगा अपने क़लम को
किसी के लिए न सही
अपने लिए लिखो
अपने क़लम के लिए लिखो
लिखोगे तो पढेंगे पढ़ने वाले
जो पढ़कर बोलते नहीं हैं
बल्कि सोचते हैं
असल क़द्रदान यही हैं
हौसला कभी कम न हो
कभी बेकार ग़म न हो
दुआ हमारी यही है

कविता अच्छी लगी.
ईद मुबारक .
प्रिय

ऐसे में आखिर लिखे अब क्यों कोई, क्या आप बतलाओगे मुझे ?

.
.
.
शब्द
शायद
अब खुद ही भूल गये हैं
कि आपस में जुड़ कर
किसी खास क्रम में 
देते एक दूसरे को सहारा
और विस्तार भी
कभी हो जाते थे
वह बहुत प्रभावी
और ताकतवर भी
रखने लगते थे हैसियत
बदल देने की
दुनिया के निजाम को
शब्द
भले ही महज दो या चार हों
बन जाते थे वह नारा
जो जिंदा कर देता था
मरी हुई कौमों को
पलट देता था तख्तो-ताज
बहाता था बदलाव की बयार
शब्द 
किसी खास की वाणी से
उच्चारित होकर
फैल जाते थे हर तरफ
बन जाते थे उम्मीदें
दिखाने लगते थे सपने
और जीने का मकसद भी

शब्द
जो दिलाते थे भरोसा
और दिलोदिमाग को सुकून
भले ही आज सब कुछ
हो रहा हो गलत-अनैतिक
पर हो जायेगा ठीक यह
बस कुछ दिनों की बात है
शब्द
जो देते थे आश्वासन सा
भले ही दिख रहा हो
हर तरफ हर कोई स्याह सा
पर निराश नहीं होना दोस्त
फिर रोशन होगा जहाँ
सच्चाई अभी जिंदा है

शब्द 
महज शब्द हो गये हैं
कौड़ियों के मोल मिलते
ईमान के बदले बिकते
किसी भी क्रम में लगाओ
अलंकार उपमायें जुटाओ
अब वे कोई अर्थ नहीं रखते

शब्द
खो चुके हैं ताकत अपनी
नहीं ला पाते हैं बदलाव
अब नहीं दिलाते उम्मीद
आश्वस्त तक नहीं करते
नहीं कहते कि सुबह आयेगी
बिकते हैं चौराहों-फुटपाथों पर
शब्द
अब हो गये हैं अर्थहीन
और नपुंसक भी
ऐसे में क्या लिखना
किसके लिये लिखना
आखिर लिखे क्यों अब कोई
क्या तुम बतलाओगे मुझे ?

Saturday, August 18, 2012

आया मुबारक दिन ईद का

rajtela1
Raj Tela

ईद पर कविता- आया मुबारक दिन ईद का






हुत दिन बाद आया
मुबारक दिन ईद का
खुशियाँ मनाने का
रंजिशें मिटाने का
निरंतर इंसान बन कर
जीने का
अमन का पैगाम
फैलाने का
गिले शिकवे दूर करने का
मोहब्बत से जीने का
गले मिलते रहने का  
आया मुबारक दिन
ईद का 

Monday, August 13, 2012

तिरंगा शान है अपनी ,फ़लक पर आज फहराए ,


Flag Foundation Of India  Flag Foundation Of India 
तिरंगा 
शान है अपनी ,फ़लक पर आज फहराए ,
फतह की ये है निशानी ,फ़लक पर आज फहराए .

रहे महफूज़ अपना देश ,साये में सदा इसके ,
मुस्तकिल पाए बुलंदी फ़लक पर आज फहराए .

मिली जो आज़ादी हमको ,शरीक़ उसमे है ये भी,
शाकिर हम सभी इसके फ़लक पर आज फहराए .

क़सम खाई तले इसके ,भगा देंगे फिरंगी को ,
इरादों को दी मज़बूती फ़लक पर आज फहराए .

शाहिद ये गुलामी का ,शाहिद ये फ़राखी का ,
हमसफ़र फिल हकीक़त में ,फ़लक पर आज फहराए .

वज़ूद मुल्क का अपने ,हशमत है ये हम सबका ,
पायतख्त की ये लताफत फ़लक पर आज फहराए .

दुनिया सिर झुकाती है रसूख देख कर इसका ,
ख्वाहिश ''शालिनी''की ये फ़लक पर आज फहराए .

         शालिनी कौशिक [कौशल]

एक निवेदन सभी महिला ब्लोग्गर्स  से-आपको शिखा कौशिक  के एक नए ब्लॉग ''WORLD'sWOMAN BLOGGERS ASSOCIATION -JOIN THIS NOW  ''का लिंक दे रही हूँ यहाँ जुड़ें और महिला शक्ति को संगृहीत होने का सुअवसर दें.
             आभार 
           शालिनी कौशिक 





Sunday, August 12, 2012

उन्हें पढ़ना नहीं आता

बहुत अरमान हैं दिल में, हमें गढ़ना नहीं आता
पहाड़ों की कठिन मंजिल, हमें चढ़ना नहीं आता

सितारे टिमटिमाते हैं, मगर है चाँदनी गायब
अन्धेरे में सही पथ पर, हमें बढ़ना नहीं आता

हमारी ताक में दुश्मन, छिपे बैठे हैं झुरमुट में
बिना हथियार के उनसे, हमें लड़ना नहीं आता

समझती ही नहीं है अब नजर, नजरों की भाषा को
हमें लिखना नहीं आता, उन्हें पढ़ना नहीं आता

फटे ढोलक के ताले हैं, सुरों का रूप ओझल है
नई सी खाल तबले पर, हमें मढ़ना नहीं आता

Monday, August 6, 2012

अन्ना टीम :वहीँ नज़र आएगी.



अन्ना टीम :
वहीँ नज़र आएगी.




शेखी बखारने वालों की फ़िलफौर शामत आएगी,
रफ्ता-रफ्ता सामने पुख्ता हक़ीकत आएगी.

आगाज़ कर रहे थे जो रहनुमा बनकर यहाँ,
रहनुमाई वही अब सियासत में रंगकर आएगी.

तोहमतें लगा रहे थे आज के नेताओं पर ,
है ग़नीमत सियासत की कुछ समझ तो आएगी.

मुबतला रहते थे ये अशखास से शबो-रोज़,
वोट देने के लिए न शक्ल नज़र आएगी.

खिदमतें जो हो रही आरास्ता कर अंजुमन,
इत्तहाद वह नज़र कहीं नहीं आएगी.

अवाम-सियासत ही दोनों करप्शन में हैं रंगे .
खुदगर्ज़ जनता कैसे खलल बन आएगी.

फिरकेबंदी में फंसे हैं जैसे सारे दल यहाँ,
अन्ना टीम ''शालिनी''को वहीँ नज़र आएगी.


                 शालिनी कौशिक 
                            [कौशल]

 शब्द  - अर्थ  -फ़िलफौर-तुरंत ,शामत-विपत्ति,शेखी -घमंड ,मुब्तला-घिरे रहना ,
इत्तेहाद-एकता,आरास्ता-सजाना ,फिरकेबंदी-दलबंदी 

Sunday, August 5, 2012

न कोशिश ये कभी करना .


न कोशिश ये कभी करना .



दुखाऊँ दिल किसी का मैं -न कोशिश ये कभी करना ,
बहाऊँ आंसूं उसके मैं -न कोशिश ये कभी करना.

नहीं ला सकते हो जब तुम किसी के जीवन में सुख चैन ,
करूँ महरूम फ़रहत से-न कोशिश ये कभी करना .

चाहत जब किसी की तुम नहीं पूरी हो कर सकते ,
करो सब जो कहूं तुमसे-न कोशिश ये कभी करना .

किसी के ख्वाबों को परवान नहीं हो तुम चढ़ा सकते ,
हक़ीकत इसको दिखलाऊँ-न कोशिश ये कभी करना .

ज़िस्म में मुर्दे की जब तुम सांसे ला नहीं सकते ,
बनाऊं लाश जिंदा को-न कोशिश ये कभी करना .

समझ लो ''शालिनी ''तुम ये कहे ये जिंदगी पैहम ,
तजुर्बें मेरे अपनाएं-न कोशिश ये कभी करना .
 
                                  शालिनी कौशिक 
                                       [कौशल]