मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Saturday, July 28, 2012

रफ़्तार जिंदगी में सदा चलके पायेंगें.



Sky is the limit

लम्हे कभी फुर्सत के हमें मिल न पायेंगें,
रफ़्तार जिंदगी में सदा चलके पायेंगें.

बैठे अगर उदास कहीं टूट जायेंगें,
इस दिल में जोश भरके ही कुछ ढूंढ पायेंगें.

ये जिंदगी देती हमें कई राहें निरंतर ,
पाएंगे मंजिल इनपे गर हम बढ़ते जायेंगें.

न देखना मुड़कर कभी भूले से भी पीछे,
राहों के पत्थर रोकने को रोज़ आयेंगें .

बढ़ना है जिंदगी में अगर तुमको ''शालिनी''
ऐसे ख्याल दिल में तेरे खूब आयेंगे.

                           शालिनी कौशिक 
                                       [कौशल]




Thursday, July 26, 2012

उपहार कहाँ से लाऊँ ?

 कुछ लिखकर चुप बैठूँ, या अन्तर्मन में कुछ गाऊँ!
अपनी व्यथा-कथा को, कैसे जग को आज सुनाऊँ!!

गली-गली हैं चोर-लुटेरे, पथ में छाया अँधियारा,
कौन डगर से अपने घर को, सही-सलामत जाऊँ!

अपनी झोली भरते जाते, सत्ता के सौदागर,
मँहगाई की मार पड़ी है, क्या कुछ खाऊँ-खिलाऊँ!

ग़ज़ल-गीत से मन भर जाता, पेट नहीं भरता है,
धन-दौलत की पौध खेत में, कैसे अब उपजाऊँ!

रिश्तेदारी नहीं रही अब, लोभी हुआ ज़माना,
वर के चढ़े भाव ऊँचे, उपहार कहाँ से लाऊँ!

महफिल में सफेद कौओं को, “रूप” परोसा जाता,
बाज़ों से भोली चिड़ियों को, कैसे आज बचाऊँ!

Saturday, July 21, 2012

रमज़ां का महीना है RAMZAAn KA MAHEENA HAI

( यह "कलाम-ए-रमज़ान" इस लिंक पर सुना भी जा सकता है : http://www.box.net/shared/i9lgzodaylaa58ioqhqk )


रमज़ां का महीना है, शान इसकी निराली है
इस महीने में भर जाती, हर वो झोली, जो ख़ाली है
रमज़ां का महीना है.....

मस्जिद में सभी मोमिन, मशग़ूल-ए-इबादत हैं
कुछ सजदे में हैं, तो कुछ, कर रहे तिलावत हैं
दरबार-ए-इलाही में, हर बन्दा सवाली है
इस महीने में भर जाती, हर वो झोली, जो ख़ाली है
रमज़ां का महीना है.....

हर मोमिन के घर में, अल्लाह की रहमत है
हर शय में हुई अब तो, बरकत ही बरकत है
हर छोटे-बड़े ने लौ, अल्लाह से लगा ली है
इस महीने में भर जाती, हर वो झोली, जो ख़ाली है
रमज़ां का महीना है.....

बाज़ारों भी देखो, रौनक़ बड़ी छाई है
करने को ख़रीदारी, ख़लक़त चली आई है
ताजिरों ने भी अपनी, दूकान सजा ली है
इस महीने में भर जाती, हर वो झोली, जो ख़ाली है
रमज़ां का महीना है..... ।
(---मुईन शमसी)
Source : http://moinshamsi.blogspot.in/2011/08/ramzaan-ka-maheena-hai-all-rights-are.html

Tuesday, July 17, 2012

समझें हम .


google se sabhar 



भारत पाकिस्तान की जनता के लिए ये एक खुशखबरी से कम नहीं है कि दिसंबर -जनवरी   में भारत पाकिस्तान  3 वन डे और २ टवेंटी  -20 मैच खेलेंगें  . २००७ के बाद भारत पाक की ये पहली क्रिकेट सीरीज कही जा सकती है .मुंबई हमले के बाद संबंधों पर ज़मी ये बर्फ अब पिघलने की ओर है और यही प्रार्थना है कि ये सम्बन्ध अब कभी दुश्मनी   के धुंध लके   में न रहें और पुराने  समय में जो हिन्दू-मुस्लिम प्रेम की कहानियां हमारे बड़ों के द्वारा हमे सुनाई जाती रही आज फिर वे हमारी  आँखों  के समक्ष  प्रत्यक्ष हो जाएँ . मेरी एक ग़ज़ल इसी सम्बन्ध में मेरे देशवासियों  की भाव नाओं को कुछ  यूँ उजागर करती है-
                     
''मुख्तलिफ  ख्यालात भले रखते हों मुल्क से बढ़कर न खुद  को समझें हम,
बेहतरी हो जिसमे अवाम की अपनी ऐसे क़दमों को बेहतर  समझें हम.

है ये चाहत तरक्की की राहें आप और हम मिलके पार करें ,
जो सुकूँ साथ मिलके चलने में इस हकीक़त को ज़रा समझें हम .

कभी हम एक साथ रहते थे ,रहते हैं आज जुदा थोड़े से ,
अपनी आपस की गलतफहमी को थोड़ी जज़्बाती  भूल  समझें हम .
                                   
देखकर आंगन में खड़ी दीवारें आयेंगें तोड़ने हमें दुश्मन ,
ऐसे दुश्मन की गहरी चालों को अपने हक में कभी न  समझें हम .

न कभी अपने हैं न अपने कभी हो सकते ,
पडोसी मुल्कों की फितरत को खुलके समझें हम .

कहे ये ''शालिनी'' मिल  बैठ मसले  सुलझा लें ,
अपने अपनों की मोहब्बत को अगर समझें हम .

         शालिनी कौशिक 
                  [ कौशल ]

Monday, July 16, 2012

ग़ालिब और आम -मनव्वर राना

 
अनुवाद: डा. अनवर जमाल

अल्लाह जानता है मुहब्बत हमीं ने की
ग़ालिब के बाद आमों की इज़्ज़त हमीं ने की

जैसे भी आम हम को मिले हम ने खा लिए
आमों का मान रखा मुरव्वत हमीं ने की

खट्टे भी खाए शौक़ से मीठे भी खाए हैं
क़िस्मत के फ़ैसले पे क़नाअत हमीं ने की

खाने को आम किसने नहीं खाए हैं जनाब
लेकिन बयान आम की लज़्ज़त हमीं ने की

तोहफ़े में हमने आम लिए भी दिए भी हैं
पूरी रसूले पाक की सुन्नत हमीं ने की

लोगों के पास एक नहीं चार बाग़ हैं
इस बात की ख़ुदा से शिकायत हमीं ने की

हमको डरा नहीं सका शुगर का ख़ौफ़ भी
ऐ मौत तेरे सामने हिम्मत हमीं ने की

बारिश के बावजूद भी हम बाग़ में रहे
सज्दे में सब गए थे इबादत हमीं ने की

क़िस्मत में इस फ़क़ीर के इक पेड़ भी नहीं
लेकिन अमीरे शहर की दावत हमीं ने की

बोले ‘सिराज महदी‘ से महफ़िल में ‘इन्सराम‘
दावत तो सब ही करते हैं नीयत हमीं ने की

‘ग़ालिब‘ मलीहाबाद नहीं आ सके तो क्या
उनकी तरफ़ से हर जगह शिरकत हमीं ने की

Tuesday, July 10, 2012

शीशा हमें तो आपको पत्थर कहा गया

                      ग़ज़ल


शीशा हमें तो आपको पत्थर कहा गया
दोनों के सिलसिले में ये बेहतर कहा गया

ख़ुददारियों की राह पे जो गामज़न रहे
उनको हमारे शहर में ख़ुदसर कहा गया

इक मुख्तसर सी झील न जो कर सका उबूर
इस दौर में उसी को शनावर कहा गया

उसने किया जो ज़ुल्म तो हुआ न कुछ भी ज़िक्र
मैंने जो कीं ख़ताएं तो घर घर कहा गया

मैं ही वो सख्त जान हूं कि जिसके वास्ते
तपती हुई चट्टान को बिस्तर कहा गया

- ताज़ीज़ बस्तवी, रहमत गंज, गांधी नगर, बस्ती

Sunday, July 8, 2012

मंज़िल पास आएगी.


मिशन लन्दन ओलम्पिक हॉकी गोल्ड 
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हौसले कर बुलंद अपने ,मंज़िल पास आएगी,
जोश भर ले दिल में अपने मंज़िल पास आएगी.

तक रहा है बैठकर क्यों भागती परछाइयाँ ,
उठ ज़रा बढ़ ले तू आगे मंज़िल पास आएगी.

दूसरों का देखकर मुंह न पायेगा फ़तेह कभी ,
रख ज़रा विश्वास खुद पर मंज़िल पास आएगी.

भूल से भी मत समझना खुद को तू सबसे बड़ा,
सर झुका मेहनत के आगे मंज़िल पास आएगी.

गर नशा करना है तुझको चूर हो जा काम में ,
लक्ष्य का पीछा करे तो मंज़िल पास आएगी.

''शालिनी'' कहती है तुझको मान जीवन को चुनौती ,
बिन डरे अपना ले इसको मंज़िल पास आएगी.

                              शालिनी कौशिक 
                                    [कौशल ]

Wednesday, July 4, 2012

शाम को जिस वक्त ख़ाली हाथ घर जाता हूं मैं

मुरादाबाद में डा. भीम राव अंबेडकर ऑडिटोरियम में मासूम नहटौरी फ़ाउंडेशन के ज़ेरे अहतमाम एमपी ज़फ़र अली नक़वी की सदारत में एक कुल हिंद मुशायरे का आयोजन किया गया। ख़ुसूसी मेहमान के तौर पर उत्तराखंड के गवर्नर जनाब अज़ीज़ क़ुरैशी भी तशरीफ़ फ़र्मा थे। इस मौक़े पर मशहूर शायरों के कुछ पसंदीदा शेर पेश ए खि़दमत हैं-

छुपाना चाहूं तो ख़ुद को छुपा नहीं सकता
तिरी निगाह के आगे कितना बेबस हूं मैं
-वसीम बरेलवी

उसके ज़हनो दिल पे काविश थीं हवस की आंधियां
पास आया तो मेरी पाकीज़गी से डर गया
-डा. सरिता शर्मा

मिरी निगाह बदन पे ठहर गई वर्ना
वो अपनी रूह मेरे नाम करने वाला था
-मुकेश अमरोहवी

शाम को जिस वक्त ख़ाली हाथ घर जाता हूं मैं
मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूं मैं
-राजेश रेड्डी

दिया साथ हमने ख़ुशी का भी कभी ग़म के साथ हो लिए
तिरा नाम आया तो हंस लिए तिरी याद आई तो रो लिए
-मुमताज़ नसीम