मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Monday, May 21, 2012

इतने न कर जुल्म माँ बाप पर बन्दे !


इतने न कर जुल्म माँ बाप पर बन्दे !

दुनियावी तजुर्बा है हक़ीकत में है होता ;
जो माँ -बाप का न होता किसी का नहीं होता .

जब टोकता है उनको दो टुकड़ों के लिए ;
मुंह से कहें न कुछ पर दिल तो है रोता .

तूने भरी एक आह वे जागे रात भर
वे तडपे दर्द से तू आराम से सोता ?

जिसने करी दुआ तू रहे सलामत ;
उनकी ही मौत की तू राह है जोहता .

इतने न कर जुल्म माँ बाप पर बन्दे ;
वे सोचने लगे कि बेऔलाद ही होता .
शिखा कौशिक
'' vikhyat ''

Sunday, May 20, 2012

उदास लम्हों से राब्ता है

अजब मसायल से वास्ता है
न हल है कोई न रास्ता है

गुज़र रहा है ज़माना कुछ यूं
उसूल कोई न ज़ाब्ता है

मिज़ाज क्यूं हो गया है ऐसा
ग़र्ज़ किसी से न वास्ता है

ग़रीबों का हमनवा है ग़म और
ख़ुशी रईसों की दाश्ता है

निशात के दिन गुज़र गए ‘शाज़‘
उदास लम्हों से राब्ता है

शाज़ रहमानी,
कटिहार, बिहार

Thursday, May 17, 2012

आज खिले कल है मुरझाना


जीवन एक मुसाफिरखाना
जो आया है, उसको जाना

झूठी काया, झूठी छाया
माया में मत मन भरमाना

सुख के सपने रिश्ते-नाते
बहुत कठिन है इन्हें निभाना

ताकत है तो, सब है अपने
कमजोरी में झिड़की-ताना

आँखों के तारे दुर्दिन में
जान गये हैं आँख दिखाना

इस दुनिया की यही कहानी
कल हो जाता आज पुराना

सुमन सीख देते हैं सबको
आज खिले कल है मुरझाना

“रूप” न टिकता है यौवन का
क्षमा न करता कभी ज़माना