मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Monday, January 30, 2012

Saturday, January 28, 2012

चाँदनी भी कहर सा ढाती है


जब भी पुरवा बयार आती है
ज़िन्दगी खूब खिलखिलाती है

जब भी बादल फलक घिरते हैं
याद प्रीतम की तब सताती है

जब भी भँवरे गुहार करते हैं
तब कली ग़ुल सा मुस्कराती है

सर्दियाँ शीत जब उगलतीं हैं
चाँदनी भी कहर सा ढाती है

ज़िन्दगीभर सफर में रहना है
मंज़िलें हाथ नहीं आती है

“रूप” रहता नहीं सलामत है
धूप यौवन की ढलती जाती है

Sunday, January 22, 2012

बहार हो कि खिज़ां मुस्कुराए जाते हैं Bahaar

फेसबुक की सौग़ात

बहार हो कि खिज़ां मुस्कुराए जाते हैं,
हयात हम तेरा एहसाँ उठाए जाते हैं |
सुलगती रेत हो बारिश हो या हवाएं हों,
ये बच्चे फिर भ़ी घरौंदे बनाए जाते हैं |
ये एहतमाम मुहब्बत है या कोई साज़िश,
जो फूल राहों में मेरी बिछाए जाते हैं |
समझ सको तो हैं काफी ये आँख में आंसू,
के दिल के ज़ख्म किसे कब दिखाए जाते हैं |
कोई भ़ी लम्हा क़यामत से कम नहीं फिर भ़ी,
तुम्हारे सामने हम मुस्कुराए जाते हैं |

Friday, January 13, 2012

फिर मेरे शहर से गुज़रा है वो बादल की तरह

हमारे दोस्त श्रीपाल चौधरी साहब के प्रोफ़ाइल में हमने किसी का एक क़ौल देखा,
The beauty of male has not yet been portrayed by the only one who can do so-THE FEMALE.

उनसे इस बारे में वहीं चैट हुई और हमने उन्हें एक कमेंट दिया।
मर्द की ख़ूबसूरती के बारे में औरत ने कभी कुछ बयान नहीं किया, यह कहना ग़लत है। परवीन शाकिर की ग़ज़ल में भी कुछ अहसास और जज़्बे छिपे हुए हैं और इस तरह का लिट्रेचर जमा करने के लिए कई ज़िंदगियां चाहिएं। देखिए उनकी एक ख़ूबसूरत ग़ज़ल, जो आपको परवीन शाकिर साहिबा का गरवेदा बना देगी।
फिर मेरे शहर से गुज़रा है वो बादल की तरह
दस्ते-गुल फैला हुआ है मेरे आँचल की तरह ।

कह रहा है किसी मौसम की कहानी अब तक
जिस्म बरसात मे भीगे हुये जंगल की तरह ।

ऊंची आवाज़ मे उसने तो कभी बात न की
ख़फ़गियों में भी वो लहजा रहा कोयल की तरह।

मिल के उस शख्श से मैं लाख खामोशी से चलूँ
बोल उठती है नज़र पाँव के छागल की तरह ।

पास जब तक वो रहे दर्द थमा रहता है
फैलता जाता है फिर वो आँख के काजल की तरह ।

अब किसी तौर से घर जाने की सूरत ही नहीं
रास्ते मेरे लिए हो गए हैं दलदल की तरह ।

जिस्म के तीरओ -आसेबज़दा मंदिर में
दिल सरे शाम सुलग उठता है संदल की तरह ।

दस्ते-गुल - पंखुड़ी 
ख़फ़गियों - नाराज़गियों 
तीरओ - अन्धकारमय और
आसेबज़दा - प्रेतग्रस्त 

 
Parvin Shakir

http://www.facebook.com/note.php?note_id=172158512842020

Wednesday, January 4, 2012

इन्सान आदमखोर है


पत्थरों के देश में, हर आइना कमजोर है
आदमी के वेश में, इन्सान आदमखोर है

है हवाओं में जहर, हर ओर बरपा है कहर
लूट-हत्याओं का आलम, छा रहा हर ओर है

स्नेह बिन कैसे जलेगा, भाईचारे का दिया
नफरतों ने काट दी, सम्बन्ध की अब डोर है

घोसलों की हो हिफाजत, अब यहाँ कैसे भला
पेड़ की हर शाख़ पर, बैठा हुआ जब चोर है

दूध की अब है सुरक्षा, बिल्लियों के हाथ में
अंजुमन में हो रहा अब, बन्दरों का शोर है

“रूप” के मेले लगे हैं, बिक रही है आबरू
आज भ्रष्टाचार का, कुछ ओर है ना छोर है

Tuesday, January 3, 2012

वस्ल के लिए पागल वो भी है और मैं भी हूँ


मुहब्बत में घायल वो भी है और मैं भी हूँ,
वस्ल के लिए पागल वो भी है और मैं भी हूँ,
तोड़ तो सकते हैं सारी बंदिशें ज़माने की,
लेकिन घर की इज्जत वो भी है और मैं भी हूँ,

{वस्ल = मिलन}

"ब्लॉगर्स मीट वीकली
(24) Happy New Year 2012"
में आयें .
आपको यहाँ कुछ नया और हट कर मिलेगा .

Sunday, January 1, 2012

वो लोग और होंगे जो हारे है मुहब्बत मे

आज अपने ब्लॉग ‘वेद क़ुरआन‘ के फ़ालोअर्स पर नज़र डाली तो वहां जावेद साहब का नाम नज़र आया। हम उनके ब्लॉग पर गए तो आपके लिए यह रचना ले आए।
आप भी देखें-

चंद अल्फाज़ो मे भला कैसे समेटू मैं बता....


चंद अल्फाज़  मे भला कैसे समेटू मैं बता
मेरा इश्क़ कोई ग़ज़ल नही एक पाक सिपारा है

नही लिपटे है इसमे चाँद सितारे फिर भी
यही मेरी इबादत यही जन्नत का नज़ारा है

दर्द भी,जुदाई भी और दुनिया के हैं मरहले
फिर भी हर आयात को इसकी दिल मे उतारा है

कितनी दुआए की है खुदा से,रातो को जाग कर
कैसे बताए कितनी सिद्दत से इसको सँवारा है

वो लोग और होंगे जो हारे है मुहब्बत मे
मैने तो गम उठा के इसे और निखारा है

पा कर के साथ उसका “जावेद” ने ये जाना है
ज़िंदगी उसके साथ हो तो फिर पीराने बहाराँ है

*पीराने बहाराँ= बहार लाने वाला