मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Monday, December 31, 2012

आप उसे आवारा या बदचलन मत कह देना Modern Girl


एक तन्ज़ एक हक़ीक़त
किसी लड़की को आप रात गए किसी पब से या सिनेमा हॉल से निकलते देखें
या दिन दहाड़े किसी पार्क या खंडहर में किसी के साथ घुसते देखें तो
आप उसे आवारा या बदचलन मत कह देना
क्योंकि वह पढ़ी-लिखी है, समझदार है, जवान है, बालिग़ है
और तरक्क़ी कर रही है
वह ख़ुद को कितना भी सजाए,
अपना कुछ भी दिखाए,
चाहे ज़माने भर को रिझाए
चाहे उसकी आबरू ही क्यों न लुट जाए
आप उसे कभी ग़लत न कहना
दोष सिर्फ़ लड़कों को, समाज को, पुलिस और नेताओं को देना
ऐसा करके आप इज़्ज़त पाएंगे
समाज का चलन उल्टा है
सच से इसे बैर है।
आप सच कहेंगे तो ज़माना आपका दुश्मन हो जाएगा
जड़ों को पानी देकर यह शाख़ें कतरता है

14 comments:

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

नववर्ष की ढेरों शुभकामना!
आपकी यह सुन्दर प्रविष्टि आज दिनांक 01-01-2013 को मंगलवारीय चर्चामंच- 1111 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

प्रेम सरोवर said...

आपकी प्रस्तुति अच्छी लगी। मेरे नए पोस्ट पर आपकी प्रतिक्रिया की आतुरता से प्रतीक्षा रहेगी। नव वर्ष 2013 की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ। धन्यवाद सहित

पी.सी.गोदियाल "परचेत" said...

दिन तीन सौ पैसठ साल के,
यों ऐसे निकल गए,
मुट्ठी में बंद कुछ रेत-कण,
ज्यों कहीं फिसल गए।
कुछ आनंद, उमंग,उल्लास तो
कुछ आकुल,विकल गए।
दिन तीन सौ पैसठ साल के,
यों ऐसे निकल गए।।
शुभकामनाये और मंगलमय नववर्ष की दुआ !
इस उम्मीद और आशा के साथ कि

ऐसा होवे नए साल में,
मिले न काला कहीं दाल में,
जंगलराज ख़त्म हो जाए,
गद्हे न घूमें शेर खाल में।

दीप प्रज्वलित हो बुद्धि-ज्ञान का,
प्राबल्य विनाश हो अभिमान का,
बैठा न हो उलूक डाल-ड़ाल में,
ऐसा होवे नए साल में।

Wishing you all a very Happy & Prosperous New Year.

May the year ahead be filled Good Health, Happiness and Peace !!!

Neetu Singhal said...

यदि सर्वोच्च न्यायलय बलात्कार या अन्य किसी अपराध के दोषी को
निर्दोष निर्णित कर ससम्मान मुक्त कर दे तो हमारा उस (निर्णित)निर्दोष
मानना अनिवार्य है बेशक निर्णित निर्दोष ने बलत्कार या अन्य कोई
अपराध किया हो अथवा न किया हो,
आज देश के सत्ताधारी नेता-मंत्री भ्रष्टाचार पर वार्त्तालाप
करने से भी बचते हैं इस कारण कि भ्रष्टाचार ही उनके कुकर्मो का रक्षा-कवच
है परिणामतस भ्रष्टाचार रूपी विषाणु द्रुत गति से संचारित हो कर महामारी
का रूप धर चुका है जिससे की लगभग प्रत्येक नागरिक ग्रसित है ( कोई न्यूनतम
तो कोई अधिकतम ),
अब मुझे ये समझाइये ऐसी कौन सी सुई का आविष्कार हो गया
या ऐसी कौन सी बूंदें बन गई कि जिसको लगाकर या पिलाकर सर्वोच्च-उच्च
न्यायालयों के न्यायाधिशों या उसके अधिनस्थ न्यायालयों के न्यायाधिशों उक्त
विषाणु का प्रभाव शुन्य हो जावे, यदि अविष्कार हो भी गया है तो क्यों न एक
नए अभियान के अंतर्गत ये सूई ( या बुँदे ) भारत के सारे नागरिकों को लगा दें.....


मन के - मनके said...

सत्य, दोधारू तलवार होता है.देखने के नज़रिये हैं.

मन के - मनके said...

सत्य, दोधारू तलवार होता है.देखने के नज़रिये हैं.

मन के - मनके said...

सत्य, दोधारू तलवार होता है.देखने के नज़रिये हैं.

मन के - मनके said...

सत्य, दोधारू तलवार होता है.देखने के नज़रिये हैं.

DR. ANWER JAMAL said...

हमारे समाज का दोग़लापन कैसे दूर हो ?
नीतू सिंघल जी ! आपने जिस बात को उठाया है, उस पर वाक़ई विचार किया जाना चाहिए। इससे आगे बढ़कर यह भी सोचा जाना चाहिए कि बलात्कार या हत्या के जिन मुजरिमों के लिए कोर्ट सज़ा ए मौत मुक़र्रर करता है। उन्हें राष्ट्रपति द्वारा माफ़ कर दिया जाता है। इसी के साथ समाज को ख़ुद अपने बारे में भी सोचना होगा क्योंकि ये सारे बलात्कारी और हत्यारे इसी समाज में रहते हैं।
ऐसी धारणा बन गई है कि सामूहिक नरसंहार और बलात्कार के बाद भी सज़ा से बचना मुश्किल नहीं है अगर यह काम योजनाबद्ध ढंग से किया गया हो। पहले किसी विशेष समुदाय के खि़लाफ़ नफ़रत फैलाई गई हो और उस पर ज़ुल्म करना राष्ट्र के हित में प्रचारित किया गया हो और इसका लाभ किसी राजनीतिक पार्टी को पहुंचना निश्चित हो। ऐसा करने वालों को उनका वर्ग हृदय सम्राट घोषित कर देता है। वे चुनाव जीतते हैं और सरकारें बनाते हैं और बार बार बनाते हैं। देश के बहुत से दंगों के मुल्ज़िम इस बात का सुबूत हैं। राजनैतिक चिंतन, लक्ष्य और संरक्षण के बिना अगर अपराध स्वतः स्फूर्त ढंग से किया गया हो तो एक लड़की से रेप के बाद भी मुजरिम जेल पहुंच जाते हैं जैसा कि दामिनी के केस में देखा जा रहा है।
दामिनी पर ज़ुल्म करने वालों के खि़लाफ़ देश और दिल्ली के लोग एकजुट हो गए जबकि सन 1984 के दंगों में ज़िंदा जला दिए गए सिखों के लिए यही लोग कभी एकजुट न हुए। इसी तरह दूसरी और भी बहुत सी घटनाएं हैं। यह इस समाज का दोग़लापन है। इसी वजह से इसका अब तक भला नहीं हो पाया। दूसरों से सुधार और कार्यवाही की अपेक्षा करने वाला समाज अपने आप को ख़ुद कितना और कैसे सुधारता है, असल चुनौती यह है।
एक सोचपरक कमेंट के लिए आपका शुक्रिया,
...क्योंकि अब ऐसे कमेंट कभी कभार ही देखने के लिए मिलते हैं।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

सुन्दर प्रस्तुति!

DINESH PAREEK said...

नीतू सिंघाल जी आपकी बातें बहुत ही विचारणीय हैं पर हम लोगों ने ही इन नेताओ को बनाया है ये न तो कभी सुधरे है और नहीं ऐसी कोई आशा की किरण नजर आ रही है
एक बेहाल लड़की अस्पताल मैं झुझ रही थी और हमारे नेताओ को अपनी राजनीती दिखाई दे रही थी वो इस मामले को भी छोड़ते हर मामले पर रोटी सेकते नजर आते हैं
हर कोई एक ही बात कहता नजर राटा है की ये मशाल जलनी चाहिए , दामिनी हम लोग इंसाफ दिलाके रहेंगे मैं खुद कहता हूँ
पर कैसे इस करप्ट सरकार और उनसे बतर ये हमारे देश की पुलिस किस से इंसाफ मागेंगे
21/12/12 के बाद भी हजारों की संख्या मैं बलात्कार और छेड़छाड की घटनाये हो चुकी है
इस मैं हम लोगो कही दोष है की हर बार एक इतिसाह बनाके छोड़ देते है
करने के नाम पर बस सर्धांजलि और मोमबतिया जलने के अलावा कुछ करते ही नहीं है आज हम ये नेता कहते है वो देश की बेटी थी ये तो सच है पर ये बात जब दिल्ली मैं इलाज मई लापरवाही हो रही थी तब ख्याल नहीं आया
दामिनी सिर्फ दो स्थति में ही बच सकती थी- अगर डॉक्टर भगवान होते या हमारे नेता इंसान होते!! वो दोनों ही इस हिन्दुस्तान मैं नहीं हैं तो हमारी दुआ भी कहा काम करती

दिनेश पारीक
http://dineshpareek19.blogspot.in/

DINESH PAREEK said...

नीतू सिंघाल जी आपकी बातें बहुत ही विचारणीय हैं पर हम लोगों ने ही इन नेताओ को बनाया है ये न तो कभी सुधरे है और नहीं ऐसी कोई आशा की किरण नजर आ रही है
एक बेहाल लड़की अस्पताल मैं झुझ रही थी और हमारे नेताओ को अपनी राजनीती दिखाई दे रही थी वो इस मामले को भी छोड़ते हर मामले पर रोटी सेकते नजर आते हैं
हर कोई एक ही बात कहता नजर राटा है की ये मशाल जलनी चाहिए , दामिनी हम लोग इंसाफ दिलाके रहेंगे मैं खुद कहता हूँ
पर कैसे इस करप्ट सरकार और उनसे बतर ये हमारे देश की पुलिस किस से इंसाफ मागेंगे
21/12/12 के बाद भी हजारों की संख्या मैं बलात्कार और छेड़छाड की घटनाये हो चुकी है
इस मैं हम लोगो कही दोष है की हर बार एक इतिसाह बनाके छोड़ देते है
करने के नाम पर बस सर्धांजलि और मोमबतिया जलने के अलावा कुछ करते ही नहीं है आज हम ये नेता कहते है वो देश की बेटी थी ये तो सच है पर ये बात जब दिल्ली मैं इलाज मई लापरवाही हो रही थी तब ख्याल नहीं आया
दिनेश पारीक
http://dineshpareek19.blogspot.in/

DR. ANWER JAMAL said...

बलात्कार व हत्या रोकने के लिए समाज की सोच को बदलना बुनियादी शर्त है
@ आदरणीय भाई दिनेश पारीक जी ! दामिनी जैसे घिनौने अपराधों में सिर्फ़ नेता और पुलिस को दोष देकर समाज को निरपराध नहीं माना जा सकता। बलात्कार और हत्या हमारे समाज का कल्चर है, अब से नहीं है बल्कि शुरू से ही है। तब न तो नेता होते थे और न ही पुलिस। तब क्या कारण थे ?
इसी देश में औरत को विधवा हो जाने पर सती भी किया जाता था लेकिन अब नहीं किया जाता। इसका मतलब जिस बात में समाज की सोच बदल गई, वह घिनौना अपराध भी बंद हो गया। बलात्कार और हत्या अभी तक जारी हैं तो इसका मतलब यह है कि संबंध में समाज की सोच नहीं बदली है।
दुनिया के तमाम देशों पर नज़र डालकर देखना चाहिए कि किस देश में बलात्कार और हत्या के जुर्म सबसे कम होते हैं ?
उस देश में कौन सी नैतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, आर्थिक और वैधानिक व्यवस्था काम करती है। उसके बारे में अपने देशवासियों को जागरूक करके हम अपने समाज की सोच बदल सकते हैं और उसे अपनाकर इन घिनौने अपराधों को रोका जा सकता है।

धन्यवाद !

Dr. Ayaz Ahmad said...

बलात्कार व हत्या रोकने के लिए समाज की सोच को बदलना बुनियादी शर्त है.

sahi kaha.