मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Friday, November 23, 2012

दोनों जहां मे ख़ास है अज़्मत हुसैन की Imam Husain & Karbala



(इमाम हुसैन र. को खि़राजे अक़ीदत का नज़राना सभी लोग पेश करते हैं। इस ब्लॉग के सभी  सदस्यों की तरफ़ से यह कलाम 10 मुहर्रम की निस्बत से ‘मुशायरा‘ ब्लॉग पर पेश किया जा रहा है।)

दोनों जहां मे ख़ास है अज़्मत हुसैन की

ज़हरा के घर में चांद जो चमका हुसैन का
वो परतौ ए रसूल था चेहरा हुसैन का
लेने लगे बलाएं फिर अर्ज़ो-समा सभी
दोनों जहां के लब पे था चर्चा हुसैन का

ज़हरा के लाडले हैं इब्ने अली हुसैन

ताबीर दीने अहमदे मुख़तार आप हैं
नाना के बाद क़ौम के सरदार आप हैं
उम्मत को जिस पे नाज़ है वल्लाह कुछ सिवा
अल्लाह के रसूल का किरदार आप हैं

ज़हरा के लाडले हैं इब्ने अली हुसैन

दोनों जहां मे ख़ास है अज़्मत हुसैन की
वो चश्मे किब्रिया हैं, है रिफ़अत हुसैन की
जब शाना ए रसूल ने ये मर्तबा दिया
फिर क्यों न हम यहां करें मिदहत हुसैन की

ज़हरा के लाडले हैं इब्ने अली हुसैन

होंठों पे तिश्नगी ही रही ‘अज़्म‘ मुज़्तरब
छूने को लब तरस गया पानी फ़रात का
कहने को तो यज़ीद भी उम्मत का फ़र्द था
क्या रास्ता मिलेगा उसे भी नजात का

ज़हरा के लाडले हैं इब्ने अली हुसैन

अबुल फ़ैज़ ‘अज़्म‘ सहरयावी
राष्ट्रीय सहारा उर्दू दैनिक दिनांक 23 नवंबर 2012, 8 मुहर्रम 1434 हिजरी, पृष्ठ सं. 7

शब्दार्थ-
दोनों जहां-लोक परलोक
अज़्मत -महानता
ज़हरा-इमाम हुसैन रज़ि. की वालिदा हज़रत फ़ातिमा रज़ियल्लाहु अन्हा की उपाधि
अर्ज़ो-समा-ज़मीन व आसमान
परतौ-प्रतिबिम्ब
नाना के बाद-पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के बाद
शाना-कंधा
तिश्नगी-प्यास
मुज़्तरब-बेचैन
फ़रात-एक नदी का नाम
उम्मत-समुदाय, मुस्लिम समुदाय
फ़र्द-आदमी, सदस्य
नजात-मुक्ति, परलोक में नर्क की यातना से मुक्ति

उर्दू से हिन्दी अनुवाद व शब्दार्थ: डा. अनवर जमाल ख़ां यूसुफ़ ज़ई

8 comments:

Kunwar Kusumesh said...

दोनों जहां मे ख़ास है अज़्मत हुसैन की.....vaqai

रज़िया "राज़" said...

जिस प्रकार हुसैन इस्लाम की रक्ष हेतु 72 व्यक्तियों का काफिला लेकर मदीने से करबला के लिए रवाना हुए थे, उसी घटना से प्रेरणा लेते हुए अपने पहले नमक सत्याग्रह में गांधीजी ने भी अपने साथ विभिन्न वर्ग व समाज के 72 लोगों को ही चुना। गांधीजी का मानना था कि विश्व में इस्लाम के विस्तार का कारण मुस्लिम शासकों की तलवारें नहीं बल्कि हुसैन जैसे महान शहीदों की कुर्बानी है। गांधीजी हजरत हुसैन की कुर्बानी से इस हद तक प्रेरित थे कि उनका मानना था कि यदि उनके पास भी हंजरत इमाम हुसैन जैसे मात्र 72 सिपाहियों की सेना होती तो वे भी भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई मात्र 24 घंटों में जीत सकते थे। उनका यहां तक कहना था कि यदि भारत एक सफल राष्ट्र बनना चाहता है तो इस देश को इमाम हुसैन के पद्चिन्हों पर चलना चाहिए।

DR. ANWER JAMAL said...

@ मोहतरमा रज़िया ‘राज़‘ साहिबा ! आपने बहुत अच्छी जानकारी दी कि गांधी जी ने इमाम हुसैन के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने आंदोलन को सफल बनाया। इस तरह की जानकारी आज सामने लाने की ज़रूरत है। इससे पता चलता है कि इमाम हुसैन की क़ुरबानियों से दुनिया भर के लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से किसा तरह लाभान्वित हो रहे हैं और उन्हें पता भी नहीं है।
इमाम हुसैन की क़ुरबानियां लोकहित में काम करने वालों को प्रेरणा देती आयी हैं और सदा देती ही रहेंगी।
अल्लाह हमें उनके नक्शे क़दम पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए,
आमीन !

प्रेम सरोवर said...

बहुत ही खुबसूरत प्रस्तुति । मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा। धन्यवाद।

madhu singh said...

behatareen prastuti,

Neetu Singhal said...

शहानी सहन हुसैन की जन्नत जमीन है..,
आबे-इरम्मत है और सूरत हसीन है..,
शहदे-ज़बाने-रंज हूँ मैं शीरीं बयान हूँ..,
नज्मों-नगमा संज हूँ अली की जान हूँ.....


Alpha
شهاني برداشت حسین کی جنت زمین ہے ..،
ابے - ارممت ہے اور صورت حسین ہے ..،
شهدے - ذبانے - رنج ہوں میں شیریں بیان ہوں ..،
نجمو - نگما سج ہوں علی کی جان ہوں .....

Neetu Singhal said...


रअय्यत आज़ार है जो मेरा सरे-दार है..,
तू नीवाज़ी अली है तू ही परवर दिगार.....

प्रेम सरोवर said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति। मेरे नए पोस्ट "समय की भी उम्र होती है",पर आपका इंतजार रहेगा। धन्यवाद।