मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, November 15, 2012

"हमें फुर्सत नहीं मिलती" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

वतन के गीत गाने की, हमें फुर्सत नहीं मिलती।
नये पौधे लगाने की, हमें फुर्सत नहीं मिलती।।

सुमन खिलते हुए हमने, मसल कर रख दिये सारे,
मिटे रिश्ते बनाने की, हमें फुर्सत नहीं मिलती।

मुहब्बत में अगर दम है, निभाओ आख़िरी दम तक,
लगन सच्ची लगाने की, हमें फुर्सत नहीं मिलती।

बनाओ महल तुम बेशक, उजाड़ो झोंपड़ी को मत,
रोते को हँसाने की, हमें फुर्सत नहीं मिलती।

सुबह उठकर कबाड़ा बीनते हैं, दुधमुहे बच्चे,
उन्हें पढ़ने-लिखाने की, हमें फुर्सत नहीं मिलती।

बिगाड़ा रूप हमने ही, वतन की लोकशाही का,
मेहनत से कमाने की, हमें फुर्सत नहीं मिलती।

5 comments:

Virendra Kumar Sharma said...

अच्छा चित्र है देश की दूर व्यवस्था का .

Rohitas ghorela said...

kya kahne sir ji ...

kitna kuch kah gayee ye gajal ...... waah :)

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत सुन्दर प्रविष्टि वाह!

इसे भी अवश्य देखें!

चर्चामंच पर एक पोस्ट का लिंक देने से कुछ फ़िरकापरस्तों नें समस्त चर्चाकारों के ऊपर मूढमति और न जाने क्या क्या होने का आरोप लगाकर वह लिंक हटवा दिया तथा अतिनिम्न कोटि की टिप्पणियों से नवाज़ा आदरणीय ग़ाफ़िल जी को हम उस आलेख का लिंक तथा उन तथाकथित हिन्दूवादियों की टिप्पणयों यहां पोस्ट कर रहे हैं आप सभी से अपेक्षा है कि उस लिंक को भी पढ़ें जिस पर इन्होंने विवाद पैदा किया और इनकी प्रतिक्रियायें भी पढ़ें फिर अपनी ईमानदार प्रतिक्रिया दें कि कौन क्या है? सादर -रविकर

राणा तू इसकी रक्षा कर // यह सिंहासन अभिमानी है

DR. ANWER JAMAL said...

Umda kalaam hai.

Waah...

swagatam.

शालिनी कौशिक said...

बनाओ महल तुम बेशक, उजाड़ो झोंपड़ी को मत,
रोते को हँसाने की, हमें फुर्सत नहीं मिलती।


सुबह उठकर कबाड़ा बीनते हैं, दुधमुहे बच्चे,
उन्हें पढ़ने-लिखाने की, हमें फुर्सत नहीं मिलती।
bahut shandar prastuti .par fursat milni avashay chahiye.