मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, October 25, 2012

अफ़सोस ''शालिनी''को खत्म न ये हो पाते हैं .


अफ़सोस ''शालिनी''को ये खत्म न ये हो पाते हैं .
खत्म कर जिंदगी देखो मन ही मन मुस्कुराते हैं ,
मिली देह इंसान की इनको भेड़िये नज़र आते हैं .

तबाह कर बेगुनाहों को करें आबाद ये खुद को ,
फितरतन इंसानियत के ये रक़ीब बनते जाते हैं .

फराखी इनको न भाए ताज़िर हैं ये दहशत के ,
मादूम ऐतबार को कर फ़ज़ीहत ये कर जाते हैं .

न मज़हब इनका है कोई ईमान दूर है इनसे ,
तबाही में मुरौवत की सुकून दिल में पाते हैं .

इरादे खौफनाक रखकर आमादा हैं ये शोरिश को ,
रन्जीदा कर जिंदगी को मसर्रत उसमे पाते हैं .

अज़ाब पैदा ये करते मचाते अफरातफरी ये ,
अफ़सोस ''शालिनी''को खत्म न ये हो पाते हैं .

शब्दार्थ :-फराखी -खुशहाली ,ताजिर-बिजनेसमैन ,
मादूम-ख़त्म ,फ़ज़ीहत -दुर्दशा ,मुरौवत -मानवता ,
शोरिश -खलबली ,रंजीदा -ग़मगीन ,मसर्रत-ख़ुशी ,
अज़ाब -पीड़ा-परेशानी .

शालिनी कौशिक
[कौशल ]

9 comments:

Rohitas ghorela said...

सही कहा आपने
इनका न तो कोई धर्म होता न इम्मान
बहुत ही अच्छी व सटीक।

Kunwar Kusumesh said...

शालिनी जी,इसे यूँ लिखने पर विचार करें:-

क़त्ल करते हैं,मुस्कुराते है।
ये दरिन्दे तरस न खाते हैं।
और आतंकवाद के दम पर,,
सब्रे - इंसाँ को आज़माते हैं।

अरकान: फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फैलुन
वज़न : 2 1 2 2 1 2 1 2 2 2
नमूना बहर : जब मुहब्बत जवान होती है .
बहर का नाम: बहरे-ख़फ़ीफ़ मुसद्दस मख्बून महज़ूफ़ . .

रविकर said...

सुन्दर प्रस्तुति ||

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

सादर अभिवादन!
--
बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (27-10-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

Virendra Kumar Sharma said...

दहशत गर्दी की पीड़ा को उकेरती बेहद सशक्त रचना है .शब्दार्थ देकर आपने इसे और भी उपयोगी बना दिया है .बधाई .
दहशत गर्दी की पीड़ा को उकेरती बेहद सशक्त रचना है .शब्दार्थ देकर आपने इसे और भी उपयोगी बना दिया है .बधाई .


अफ़सोस ''शालिनी''को ये खत्म न ये हो पाते हैं .

खत्म कर जिंदगी देखो मन ही मन मुस्कुराते हैं ,
मिली देह इंसान की इनको भेड़िये नज़र आते हैं .

तबाह कर बेगुनाहों को करें आबाद ये खुद को ,
फितरतन इंसानियत के ये रक़ीब बनते जाते हैं .

फराखी इनको न भाए ताज़िर हैं ये दहशत के ,
मादूम ऐतबार को कर फ़ज़ीहत ये कर जाते हैं .

न मज़हब इनका है कोई ईमान दूर है इनसे ,
तबाही में मुरौवत की सुकून दिल में पाते हैं .

इरादे खौफनाक रखकर आमादा हैं ये शोरिश को ,
रन्जीदा कर जिंदगी को मसर्रत उसमे पाते हैं .

अज़ाब पैदा ये करते मचाते अफरातफरी ये ,
अफ़सोस ''शालिनी''को खत्म न ये हो पाते हैं .

शब्दार्थ :-फराखी -खुशहाली ,ताजिर-बिजनेसमैन ,
मादूम-ख़त्म ,फ़ज़ीहत -दुर्दशा ,मुरौवत -मानवता ,
शोरिश -खलबली ,रंजीदा -ग़मगीन ,मसर्रत-ख़ुशी ,
अज़ाब -पीड़ा-परेशानी



अफ़सोस ''शालिनी''को ये खत्म न ये हो पाते हैं .

खत्म कर जिंदगी देखो मन ही मन मुस्कुराते हैं ,
मिली देह इंसान की इनको भेड़िये नज़र आते हैं .

तबाह कर बेगुनाहों को करें आबाद ये खुद को ,
फितरतन इंसानियत के ये रक़ीब बनते जाते हैं .

फराखी इनको न भाए ताज़िर हैं ये दहशत के ,
मादूम ऐतबार को कर फ़ज़ीहत ये कर जाते हैं .

न मज़हब इनका है कोई ईमान दूर है इनसे ,
तबाही में मुरौवत की सुकून दिल में पाते हैं .

इरादे खौफनाक रखकर आमादा हैं ये शोरिश को ,
रन्जीदा कर जिंदगी को मसर्रत उसमे पाते हैं .

अज़ाब पैदा ये करते मचाते अफरातफरी ये ,
अफ़सोस ''शालिनी''को खत्म न ये हो पाते हैं .

शब्दार्थ :-फराखी -खुशहाली ,ताजिर-बिजनेसमैन ,
मादूम-ख़त्म ,फ़ज़ीहत -दुर्दशा ,मुरौवत -मानवता ,
शोरिश -खलबली ,रंजीदा -ग़मगीन ,मसर्रत-ख़ुशी ,
अज़ाब -पीड़ा-परेशानी

शालिनी कौशिक said...

रोहिताश जी ,कुंवर कुसुमेश जी ,रविकर जी और डॉ,रूप चन्द्र शास्त्री जी उत्साह वर्धन हेतु आभार .
कुंवर जी मैं आगे से प्रयास करूंगी की जैसे आपने सिखाया है वैसे ही मैं अपनी लेखनी में प्रभाव ला पाऊँ.मार्गदर्शन करने हेतु आभार

yashoda agrawal said...

आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 31/10/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

मनोज कुमार said...

ग़ज़ल के भाव अच्छे लगे।

कुंवर जी जैसे ग़ज़लकार का मार्गदर्शन और सान्निध्य हो, तो बात ही औछ और होती है!

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

खूबसूरत गज़ल