मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Saturday, September 29, 2012

ग़ज़ल


तेरे ग़म को जाँ की तलाश थी, तेरे जाँ-निसार चले गये
तेरी रह में करते थे सर तलब, सरे-रहगुज़ार चले गये

तेरी कज-अदाई से हार के शब-ए-इंतज़ार चली गयी
मेरे ज़ब्त-ए-हाल से रूठकर मेरे ग़मगुसार चले गये

न सवाल-ए-वस्ल न अर्ज़-ए-ग़म, न हिकायतें न शिकायतें
तेरे अहद में दिल-ए-ज़ार के सभी इख्तियार चले गये

ये हमीं थे जिनके लिबास पर सर-ए-रू सियाही लिखी गयी
यही दाग़ थे जो सजा के हम सर-ए-बज़्म-ए-यार चले गये

न रहा जुनून-ए-रुख़-ए-वफा, ये रसन ये दार करोगे क्या
जिन्हें ज़ुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था वो गुनाहगार चले गये

6 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (30-09-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
सूचनार्थ!

Kunwar Kusumesh said...

बहरे-कामिल सालिम में कही गयी लाजवाब ग़ज़ल पढ़वाने के लिए शुक्रिया भाई अनवर जमाल जी.

शिखा कौशिक 'नूतन ' said...

GAZAL KE BARE ME JANKARI DETI POST SAMAY SAMAY PAR PRAKASHIT KAR HAMARA MARGDARSHAN KAREN .IS BEHTAREEN GAZAL KO YAHAN PRASTUT KARNE HETU AABHAR

शालिनी कौशिक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

रविकर said...

उत्कृष्ट |
बधाई भाई जी ||

काव्य संसार said...

सुंदर गजल |
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काव्य का संसार