मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, August 5, 2012

न कोशिश ये कभी करना .


न कोशिश ये कभी करना .



दुखाऊँ दिल किसी का मैं -न कोशिश ये कभी करना ,
बहाऊँ आंसूं उसके मैं -न कोशिश ये कभी करना.

नहीं ला सकते हो जब तुम किसी के जीवन में सुख चैन ,
करूँ महरूम फ़रहत से-न कोशिश ये कभी करना .

चाहत जब किसी की तुम नहीं पूरी हो कर सकते ,
करो सब जो कहूं तुमसे-न कोशिश ये कभी करना .

किसी के ख्वाबों को परवान नहीं हो तुम चढ़ा सकते ,
हक़ीकत इसको दिखलाऊँ-न कोशिश ये कभी करना .

ज़िस्म में मुर्दे की जब तुम सांसे ला नहीं सकते ,
बनाऊं लाश जिंदा को-न कोशिश ये कभी करना .

समझ लो ''शालिनी ''तुम ये कहे ये जिंदगी पैहम ,
तजुर्बें मेरे अपनाएं-न कोशिश ये कभी करना .
 
                                  शालिनी कौशिक 
                                       [कौशल]

8 comments:

Kunwar Kusumesh said...

भाव पक्ष बहुत प्रबल है.सोंच अच्छी है.

शिखा कौशिक said...

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति . मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें !

DR. ANWER JAMAL said...

भाव पक्ष बहुत प्रबल है.
Agree.

sushma 'आहुति' said...

दोस्ती कि खुबसूरत अभिवयक्ति.....

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत ख़ूब!
आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 06-08-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-963 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

रविकर फैजाबादी said...

वाह भाई वाह |
बधाई ||

udaya veer singh said...

बहुत सुन्दर . मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनायें !

veerubhai said...

ज़िस्म में मुर्दे की जब तुम सांसे ला नहीं सकते ,
बनाऊं लाश जिंदा को-न कोशिश ये कभी करना .
बहुत खूब .सार्थक ,सकारात्मक स्वर हैं रचना के .बहुत खूब .सार्थक ,सकारात्मक स्वर हैं रचना के .

ज़िस्म में मुर्दे की जब तुम सांसे ला नहीं सकते ,
बनाऊं लाश जिंदा को-न कोशिश ये कभी करना .
ram ram bhai

ram ram bhai
सोमवार, 6 अगस्त 2012
भौतिक और भावजगत(मनो -शरीर ) की सेहत भी जुडी है आपकी रीढ़ से