मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Monday, July 16, 2012

ग़ालिब और आम -मनव्वर राना

 
अनुवाद: डा. अनवर जमाल

अल्लाह जानता है मुहब्बत हमीं ने की
ग़ालिब के बाद आमों की इज़्ज़त हमीं ने की

जैसे भी आम हम को मिले हम ने खा लिए
आमों का मान रखा मुरव्वत हमीं ने की

खट्टे भी खाए शौक़ से मीठे भी खाए हैं
क़िस्मत के फ़ैसले पे क़नाअत हमीं ने की

खाने को आम किसने नहीं खाए हैं जनाब
लेकिन बयान आम की लज़्ज़त हमीं ने की

तोहफ़े में हमने आम लिए भी दिए भी हैं
पूरी रसूले पाक की सुन्नत हमीं ने की

लोगों के पास एक नहीं चार बाग़ हैं
इस बात की ख़ुदा से शिकायत हमीं ने की

हमको डरा नहीं सका शुगर का ख़ौफ़ भी
ऐ मौत तेरे सामने हिम्मत हमीं ने की

बारिश के बावजूद भी हम बाग़ में रहे
सज्दे में सब गए थे इबादत हमीं ने की

क़िस्मत में इस फ़क़ीर के इक पेड़ भी नहीं
लेकिन अमीरे शहर की दावत हमीं ने की

बोले ‘सिराज महदी‘ से महफ़िल में ‘इन्सराम‘
दावत तो सब ही करते हैं नीयत हमीं ने की

‘ग़ालिब‘ मलीहाबाद नहीं आ सके तो क्या
उनकी तरफ़ से हर जगह शिरकत हमीं ने की

3 comments:

शालिनी कौशिक said...

आमों का मौसम और ये ग़ज़ल भई वाह .अपराध तो अपराध है और कुछ नहीं ..

Kunwar Kusumesh said...

खूब है भई खूब

Kumar Radharaman said...

गिर जाए कोई टुकड़ा,मुंह से तो फेंकते हैं
इक आम को है इज्ज़त सरेआम हमने दी