मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, May 20, 2012

उदास लम्हों से राब्ता है

अजब मसायल से वास्ता है
न हल है कोई न रास्ता है

गुज़र रहा है ज़माना कुछ यूं
उसूल कोई न ज़ाब्ता है

मिज़ाज क्यूं हो गया है ऐसा
ग़र्ज़ किसी से न वास्ता है

ग़रीबों का हमनवा है ग़म और
ख़ुशी रईसों की दाश्ता है

निशात के दिन गुज़र गए ‘शाज़‘
उदास लम्हों से राब्ता है

शाज़ रहमानी,
कटिहार, बिहार

10 comments:

Reena Maurya said...

ग़रीबों का हमनवा है ग़म और
ख़ुशी रईसों की दाश्ता है
बहुत बढ़िया गजल |||

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

क्या बात है!!
आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 21-05-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-886 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

AlbelaKhatri.com said...

umda gazal........

Vaanbhatt said...

खूबसूरत ग़ज़ल...

DR. ANWER JAMAL said...

Waah.

Haqiqat bhara kalaam hai.

Kunwar Kusumesh said...

khoob.

udaya veer singh said...

ग़रीबों का हमनवा है ग़म और
ख़ुशी रईसों की दाश्ता है...

संजीदगी से आवाज देती बेहतरीन गजल .... शुक्रिया जी /

अरूण साथी said...

साधु-साधु

Dr (Miss) Sharad Singh said...

वाह...बहुत खूब...

नीरज गोस्वामी said...

Subhan Allah...Bahut khoobsurat Ghazal hai...