मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, May 17, 2012

आज खिले कल है मुरझाना


जीवन एक मुसाफिरखाना
जो आया है, उसको जाना

झूठी काया, झूठी छाया
माया में मत मन भरमाना

सुख के सपने रिश्ते-नाते
बहुत कठिन है इन्हें निभाना

ताकत है तो, सब है अपने
कमजोरी में झिड़की-ताना

आँखों के तारे दुर्दिन में
जान गये हैं आँख दिखाना

इस दुनिया की यही कहानी
कल हो जाता आज पुराना

सुमन सीख देते हैं सबको
आज खिले कल है मुरझाना

“रूप” न टिकता है यौवन का
क्षमा न करता कभी ज़माना

12 comments:

रविकर फैजाबादी said...

आमंत्रित सादर करे, मित्रों चर्चा मंच |

करे निवेदन आपसे, समय दीजिये रंच ||

--

शुक्रवारीय चर्चा मंच |

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

वाह क्या बात है!!...बहुत सुन्दर प्रस्तुति

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

टिप्पणीदाताओं का आभार!

प्रेम सरोवर said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति। मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

Dr.NISHA MAHARANA said...

“रूप” न टिकता है यौवन का
क्षमा न करता कभी ज़माना...sahi bat....

Rajesh Kumari said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ...वाह

Sushil said...

नये रूप में वाह
जम रहे हैं
मुशायरा करते रहें
हम सुन रहे हैं ।

gaganjuneja said...

very beautiful.thanks

gaganjuneja said...

very beautiful.thanks

gaganjuneja said...

very beautiful.thanks

veerubhai said...

इस दुनिया की यही कहानी
कल हो जाता आज पुराना
इस चर्चा का यह अफ़साना ,
एक का आना एक जाना .
बढ़िया रचना है सर जी .!

veerubhai said...

इस दुनिया की यही कहानी
कल हो जाता आज पुराना
इस चर्चा का यह अफ़साना ,
एक का आना एक जाना .
बढ़िया रचना है सर जी .!