मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, March 29, 2012

हम बिना पंख उड़ के आयेंगे


 जो भी आगे कदम बढ़ायेंगे।
फासलों को वही मिटायेंगे।।

 तुम हमें याद करोगे जब भी,
हम बिना पंख उड़ के आयेंगे।

यही हसरत तो मुद्दतों से है,
हम तुम्हें हाल-ए-दिल सुनाएँगे।

ज़िन्दगी का यही फ़साना है,
कभी रोयेंगे कभी गायेंगे।

ख़ामियाँ हैं, नसीहतें भी हैं,
ग़लतियों से, सुधार लायेंगे।

 “रूप” और रंग तो दिखावा है,
प्यार से प्यार आज़मायेंगे।

6 comments:

रेखा श्रीवास्तव said...

तुम हमें याद करोगे जब भी,
हम बिना पंख उड़ के आयेंगे।


ये टेलीपैथी का दूसरा रूप है. ग़ज़ल बहुत सुंदर लगी.

Reena Maurya said...

बहुत ही बढ़िया गजल है....
सुन्दर.....

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

उम्दा गजल....
सादर.

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

“रूप” और रंग तो दिखावा है,
प्यार से प्यार आज़मायेंगे।...behtarin..kash duniya roop aaur rang ke dikhawe se bahar aa sake...sadar badhayee aaur amantran ke sath

sushila said...

"“रूप” और रंग तो दिखावा है,
प्यार से प्यार आज़मायेंगे।"

बहुत सुंदर !