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मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, March 11, 2012

रात आँखों में गुज़र जाती है


 हर घड़ी उनकी याद आती है
क्यों मुहब्बत हमें सताती है

चैन छीना, करार छीना है,
रात आँखों में गुज़र जाती है

अब अकेले सफर नहीं कटता
कोई मंजिल नज़र न आती है

ईद अपनी न सूनी रह जाए
साल भर में घड़ी ये आती है

“रूप” चन्दा का बहुत प्यारा है
चाँदनी ही हमें सुहाती है

10 comments:

DR. ANWER JAMAL said...

Nice gazal.

Shikha Kaushik said...

bahut achchhe bhavon se yukt gazal .aabhar

Sadhana Vaid said...

बहुत खूबसूरत अल्फ़ाज़ में दिल के जज़्बातों को पिरोया है ! बहुत खूब !

मनोज कुमार said...

शास्त्री जी की ग़ज़ल भी एक नए अंदाज़ में होती हैं।

रविकर said...

भाव और बहाव युक्त प्रस्तुति ||

Rajesh Kumari said...

achchi ghazal likhi hai shastri ji

SM said...

बहुत बढ़िया गजल

मेरा मन पंछी सा said...

बहुत ही बढ़िया गजल:-)

mridula pradhan said...

bahot achchi lagi.....

Dr.NISHA MAHARANA said...

चैन छीना, करार छीना है,
रात आँखों में गुज़र जाती हैbahut hi acchi abhwyakti.