मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Friday, January 13, 2012

फिर मेरे शहर से गुज़रा है वो बादल की तरह

हमारे दोस्त श्रीपाल चौधरी साहब के प्रोफ़ाइल में हमने किसी का एक क़ौल देखा,
The beauty of male has not yet been portrayed by the only one who can do so-THE FEMALE.

उनसे इस बारे में वहीं चैट हुई और हमने उन्हें एक कमेंट दिया।
मर्द की ख़ूबसूरती के बारे में औरत ने कभी कुछ बयान नहीं किया, यह कहना ग़लत है। परवीन शाकिर की ग़ज़ल में भी कुछ अहसास और जज़्बे छिपे हुए हैं और इस तरह का लिट्रेचर जमा करने के लिए कई ज़िंदगियां चाहिएं। देखिए उनकी एक ख़ूबसूरत ग़ज़ल, जो आपको परवीन शाकिर साहिबा का गरवेदा बना देगी।
फिर मेरे शहर से गुज़रा है वो बादल की तरह
दस्ते-गुल फैला हुआ है मेरे आँचल की तरह ।

कह रहा है किसी मौसम की कहानी अब तक
जिस्म बरसात मे भीगे हुये जंगल की तरह ।

ऊंची आवाज़ मे उसने तो कभी बात न की
ख़फ़गियों में भी वो लहजा रहा कोयल की तरह।

मिल के उस शख्श से मैं लाख खामोशी से चलूँ
बोल उठती है नज़र पाँव के छागल की तरह ।

पास जब तक वो रहे दर्द थमा रहता है
फैलता जाता है फिर वो आँख के काजल की तरह ।

अब किसी तौर से घर जाने की सूरत ही नहीं
रास्ते मेरे लिए हो गए हैं दलदल की तरह ।

जिस्म के तीरओ -आसेबज़दा मंदिर में
दिल सरे शाम सुलग उठता है संदल की तरह ।

दस्ते-गुल - पंखुड़ी 
ख़फ़गियों - नाराज़गियों 
तीरओ - अन्धकारमय और
आसेबज़दा - प्रेतग्रस्त 

 
Parvin Shakir

http://www.facebook.com/note.php?note_id=172158512842020

9 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत बढ़िया!
लोहड़ी पर्व की बधाई और शुभकामनाएँ!

S.N SHUKLA said...

सार्थक पोस्ट, सादर.
कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधार कर स्नेह प्रदान करें.

sangita said...

बहुत खूबसूरत नज्म है |

sushma 'आहुति' said...

बेहतरीन ग़ज़ल....बहुत खूब.....

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत सुन्दर लिखा है आपने

नीरज गोस्वामी said...

LAJAWAB...

Dimple Maheshwari said...

bahut hi khubsurat

Dimple Maheshwari said...

khubsurat

DR. ANWER JAMAL said...

Thanks to all.