मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Wednesday, January 4, 2012

इन्सान आदमखोर है


पत्थरों के देश में, हर आइना कमजोर है
आदमी के वेश में, इन्सान आदमखोर है

है हवाओं में जहर, हर ओर बरपा है कहर
लूट-हत्याओं का आलम, छा रहा हर ओर है

स्नेह बिन कैसे जलेगा, भाईचारे का दिया
नफरतों ने काट दी, सम्बन्ध की अब डोर है

घोसलों की हो हिफाजत, अब यहाँ कैसे भला
पेड़ की हर शाख़ पर, बैठा हुआ जब चोर है

दूध की अब है सुरक्षा, बिल्लियों के हाथ में
अंजुमन में हो रहा अब, बन्दरों का शोर है

“रूप” के मेले लगे हैं, बिक रही है आबरू
आज भ्रष्टाचार का, कुछ ओर है ना छोर है

7 comments:

sushma 'आहुति' said...

बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.....

sangita said...

आपने बिल्कुल सही लिखा है कि आज भ्रष्टाचार का कोई ओर-छोर नहीं है |

daanish said...

स्नेह बिन कैसे जलेगा भाईचारे का दिया
नफरतों ने काट दी, सम्बन्ध की अब डोर है

मानवीय मूल्यों की हिफाज़त में कहे गए
ये तमाम शेर क़ाबिल ए ज़िक्र हैं ....
साधुवाद .

Patali-The-Village said...

सार्थक और सुन्दर रचना|

DR. ANWER JAMAL said...

Umda kalaam hai .

Sunil Kumar said...

achha likha hain aur sahi likha hain

dr. shama khan said...

senjedgi se veten ka derd nikel peda hae..beot khoob...