मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Tuesday, November 29, 2011

"प्यारी-प्यारी बातें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


बात-बात में हो जाती हैं, देखो कितनी सारी बातें।
घर-परिवार, देश-दुनिया की, होतीं सबसे न्यारी बातें।।

रातों में देखे सपनों की, दिन भर की दिनचर्या की भी,
सुबह-शाम उपवन में जाकर, होतीं प्यारी-प्यारी बातें।

बातों का नहीं ठौर-ठिकाना, बातों से रंगीन जमाना,
गली-गाँव चौराहे करते, मेरी और तुम्हारी बातें।

बातें ही तो मीत बनातीं, बातें बैर-भाव फैलातीं,
बातों से नहीं मन भरता है, सुख-दुख की संचारी बातें।

जाल-जगत के ढंग निराले, हैं उन्मुक्त यहाँ मतवाले,
ज्यादातर करते रहते हैं, गन्दी भ्रष्टाचारी बातें।

लेकिन कोश नहीं है खाली, सुरभित इसमें है हरियाली,
सींच रहा साहित्य सरोवर, उपजाता गुणकारी बातें।

खोल सको तो खोलो गठरी, जिसमें बँधी ज्ञान की खिचड़ी,
सभी विधाएँ यहाँ मिलेंगी, होंगी विस्मयकारी बातें।

नहीं “रूप” है, नहीं रंग है, फिर भी बातों की उमंग है,
कभी-कभी हैं हलकी-फुलकी, कभी-कभी हैं भारी बातें। 

Thursday, November 17, 2011

...काश मैं सब के बराबर होता

इस बलन्दी पे बहुत तन्हा हूँ,
काश मैं सब के बराबर होता |
उसने उलझा दिया दुनिया में मुझे,
वरना एक और कलंदर होता ||

Sunday, November 13, 2011

जितनी बंटनी थी बंट चुकी ये ज़मीं


जितनी बंटनी थी बंट चुकी ये ज़मीं,
अब तो बस आसमान बाकी है |
सर क़लम होंगे कल यहाँ उनके,
जिनके मुंह में ज़बान बाक़ी है ||
http://blogkikhabren.blogspot.com/2011/11/blog-post_7018.html

Thursday, November 10, 2011

मैं मोम हूँ उसने मुझे छू कर नहीं देखा

आंखों में रहा दिल में उतर कर नहीं देखा ,
कश्ती के मुसाफिर ने समन्दर नहीं देखा |
पत्थर मुझे कहता है मेरा चाहने वाला ,
मैं मोम हूँ उसने मुझे छू कर नहीं देखा |
-(अज्ञात)