मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Monday, October 24, 2011

"ज़िन्दगी धूप और छाया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


दोस्त बनके हमें रुलाया है
बेसबब उसने सितम ढाया है

भूल कर प्यार-वफा की बातें
उसने दिल को बहुत दुखाया है

ज़िन्दगी के हसीन लम्हों को
उसने पल भर में ही भुलाया है

साथ उसके जो घोंसला था बुना
आँधियों ने उसे गिराया है

उसको दिन का न उजाला भाया
नग़मगी ख़्वाब पसन्द आया है

आज मेरी है कल पराई है
आती-जाती हुई ये माया है

जिसने काँटों की चुभन झेली है
उसने फूलों का नाम पाया है

“रूप”-यौवन अधिक नहीं टिकता
ज़िन्दगी धूप और छाया है

ग़म इतना खा जाने के बाद

अब तुम्हीं से क्या छुपाएं, सब बता जाने के बाद।
हम कहाँ भूखे रहे, ग़म इतना खा जाने के बाद।।
-ग़ाफिल
Bloggers' Meet Weekly 14 का लिंक  
http://hbfint.blogspot.com/2011/10/bloggers-meet-weekly-14-character.html

Thursday, October 20, 2011

दरिया दिली अच्छी लगी

दर्द पर भी प्यार आया, चोट भी अच्छी लगी |
आज पहली बार मुझको, ज़िन्दगी अच्छी लगी ||
दर्द बख्शा गम दिया, आंसू इनायत कर दिए |
मेरे मोहसिन ये तेरी, दरिया दिली अच्छी लगी ||
(साभार अज्ञात शायर)

"निरंतर" की कलम से.....: सारे मौसम देख लिए

"निरंतर" की कलम से.....: सारे मौसम देख लिए: सारे मौसम देख लिए अब किस मौसम का इंतज़ार करूँ बहारों को खिजा में बदलते देखा महकते फूलों को मुरझाते देखा अरमानों को निरंतर टूटते देखा हसरते...

"निरंतर" की कलम से.....: तुम्हारे अंदाज़ में अजीब सी कशिश थी

"निरंतर" की कलम से.....: तुम्हारे अंदाज़ में अजीब सी कशिश थी: इस बार तुम्हारे अंदाज़ में अजीब सी कशिश थी तुम्हारी निगाहें फर्क थी तुमसे मिल कर कुछ मुझे भी होने लगा जहन में खुशनुमा अहसास हुआ दिल का धडकन...

Sunday, October 16, 2011

"निरंतर" की कलम से.....: शोख अंदाज़ अब मायूसी में बदल गया

"निरंतर" की कलम से.....: शोख अंदाज़ अब मायूसी में बदल गया: ज़ख्म खाना रोज़ का काम हो गया भरी दोपहर अन्धेरा छा गया रात दिन में फर्क करना मुश्किल हो गया सहना आदत में शुमार हो गया सब्र अब मर...

"निरंतर" की कलम से.....: माना की तुमने जिद ठान ली

"निरंतर" की कलम से.....: माना की तुमने जिद ठान ली: माना की तुमने जिद ठान ली हाँ नहीं भरने की कसम खा ली मेरी दुआओं की तासीर भी कम नहीं बड़ी शिद्दत से खुदा से माँगी है निरंतर ईमान स...

Monday, October 10, 2011

" इतना नहीं ख़फा होते" ( डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


ज़रा सी बात पे इतना नहीं ख़फा होते
हमेशा बात से मसले रफा-दफा होते

इबादतों के बिना तो खुदा नहीं मिलता
बिना रसूख के कोई सखा नहीं होते

जो दूसरों के घरों पर उछालते पत्थर
कभी भी उनके सलामत मकां नहीं होते

फ़लक के साथ जमीं पर भी ध्यान देते तो
वफा की राह में काँटे न बेवफा होते

अगर न “रूप” दिखाते डरावना अपना
तो दौरे-इश्क में दोनों ही बावफा होते

Tuesday, October 4, 2011

फ़ुरक़त ने तेरी मुझको संदल बना दिया


ज़ुबां  से कहूं तो है तौहीन उनकी
वो ख़ुद जानते हैं मैं क्या चाहता हूं
-अफ़ज़ल मंगलौरी

जब से छुआ है तुझको महकने लगा बदन
फ़ुरक़त ने तेरी मुझको संदल बना दिया
-अलीम वाजिद

ये कुछ अशआर हैं जिन्हें गाज़ियाबाद के मुशायरे में पढा गया।
यह मुशायरा २ अक्तूबर के मौके पर 'अदबी संगम' की जानिब से कराया गया।

Sunday, October 2, 2011

तीसरा बच्चा किया तो होगी जेल ?

तीसरा बच्चा करने पर अब जेल होगी ?...खुशदीप

हा हा हा ...

तीसरा बच्चा किया तो होगी जेल
ट्रांसफर होगा छोटी से बड़ी जेल

जेल से डरता कौन पति है
पत्नी जेलर चलाए घर की जेल

मुक्ति का समय सुहाना आया रे
अब बना दो जमकर बीवी की रेल

अकल ठिकाने लगा दो उनकी
जिन्होंने बखशी तुम्हें घर की जेल