मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, September 29, 2011

" सबको प्यारा लगता है" ( डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



सुखद बिछौना सबको प्यारा लगता है
यह तो दुनिया भर से न्यारा लगता है

जब पूनम का चाँद झाँकता है नभ से
उपवन का कोना उजियारा लगता है

सुमनों की मुस्कान भुला देती दुखड़े
खिलता गुलशन बहुत दुलारा लगता है

जब मन पर विपदाओं की बदली छाती
तब सारा जग ही दुखियारा लगता है

देश चलाने वाले हाट नहीं जाते
उनको तो मझधार किनारा लगता है

बातों से जनता का पेट नहीं भरता
सुनने में ही प्यारा नारा लगता है

दूर-दूर से “रूप” पर्वतों का भाता
बाशिन्दों को कठिन गुजारा लगता है

Wednesday, September 28, 2011

एक कतआ ....ड़ा श्याम गुप्त....

गौरैया हमारे दर
वो आये हमारे दर इनायत हुई ज़नाब |
आये  बाद बरसों  आये  तो  ज़नाब |
इस मौसमे-बेहाल में बेहाल आप हैं -
मुश्किल से मयस्सर हुए दीदार ऐ ज़नाब ||

आये बाद बरसों

Monday, September 26, 2011

वो आएंगे तो हड़काएंगे ही

इस दुनिया में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो यह मानते हैं कि

लिखें हम सही लाख मगर मुसलमां
समझके वो आएंगे तो हड़काएंगे ही

यह हमने मंसूर अली हाशमी साहब की ग़ज़ल पढ़कर कहा है .
उनकी ग़ज़ल यह है .

Blogging at any cost !


लिखना ज़रूरी है !




लिखो कुछ भी; वो पढ़ने आयेंगे ही,

भले दो शब्द ; पर टिप्याएंगे ही.

समझ में उनके आये या न आये,
प्रशंसा करके वो  भर्माएंगे ही. 

जो दे गाली, तो समझो प्यार में है!
कभी इस तरह भी तड़पाएंगे ही.

न जाओ उनकी 'साईट' पर कभी तो,
बिला वजह भी वो घबराएंगे ही.

कभी 'यूँही' जो लिखदी बात कोई ! 
तो धोकर हाथ पीछे पड़जाएंगे ही.

बहुत गहराई है इस 'झील' में तो,
जो उतरे वो तो न 'तर' पाएंगे ही. 

ये बे-मतलब सा क्या तुम हांकते हो!
न समझे है न हम समझाएंगे ही !!

लगा है उनको कुछ एसा ही चस्का,  
कहो कुछ भी वो सुनने आयेंगे ही.
http://mansooralihashmi.blogspot.com/2011/09/blogging-at-any-cost.html?showComment=1317042716126#c4083872711169427504

आज़ाद फिलिस्तीन की संभावना कितनी है ?


एक शायर असद रज़ा के शब्दों में

सहयूनी तशददुद ओ मज़ालिम की वजह से
हालात अगरचे हैं वहां पर बड़े संगीन
ये अज्म से 'अब्बास' के होने लगा है ज़ाहिर
अब जल्द ही हो जाएगा आज़ाद फिलिस्तीन


सहयूनी तशददुद - यहूदियों की हिंसा , मज़ालिम - जुल्म का बहुवचन,


आज सोमवार है और यह दिन हिंदी ब्लॉग जगत में 'ब्लॉगर्स मीट वीकली' के लिए जाना जाता है। जो लोग नए नए ब्लॉगर बने हैं वे इस मीट के जरिये पुराने और अनुभवी ब्लॉगर्स के संपर्क में आते हैं और उनकी पोस्ट्‌स को देखकर बहुत कुछ सीखते हैं। सीखने वाली बातों में सबसे बड़ी बात सभ्यता और शालीनता है। ब्लॉगर होने का मतलब यह तो नहीं है कि बदतमीज़ी की जाए या जो चाहो वह कह दो, जिसे चाहो उसे कह दो।
आलोचना का तरीक़ा भी सभ्य होना चाहिए और यह भी देख लेना चाहिए कि शब्द भी सभ्य हों।
साथ रहना है तो सम्मान देना ही पड़ेगा ।
अभद्र लोग खुद रिश्तों को तोड़ते चले जाते हैं।
ब्लॉगिंग का इस्तेमाल जुड़ने  के लिए होना चाहिए।
इन पंक्तियों पर हम सब को गौर करना चाहिए।

Sunday, September 25, 2011

" हो गये उनके हम वो हमारे हुए" ( डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


उनके आने से दिलकश नज़ारे हुए
मिल गई जब नज़र तो इशारे हुए

आँखों-आँखों में बातें सभी हो गईं
हो गये उनके हम वो हमारे हुए

रस्मों-दस्तूर की बेड़ियाँ तोड़कर
अब तो उन्मुक्त पानी के धारे हुए

सारी कलियों को खिलना मयस्सर नहीं
सूख जातीं बहुत मन को मारे हुए

कितने खुदगर्ज़ आये-मिले चल दिये
मतलबी यार सारे के सारे हुए

जो दिलों की हैं धड़कन को पहचानते
बेसहारों के वो ही सहारे हुए

“रूप”-रस का है लोभी जमाना बहुत
चूस मकरन्द भँवरे किनारे हुए

Saturday, September 24, 2011

एक नज़्म....ड़ा श्याम गुप्त.....

मैंने उस वक्त को इस दिल में सजा रखा है |
तेरी  तस्वीर को  बटुए में  छुपा रखा  है |

मेरे संग है अभी भी तू  इन ज़वाँ यादों में ,
खुद को घिरा रखा है वक्त के हमसायों में |

ख्यालों में अब भी जवाँ धडकनों की बातें हैं,
वक्त  को तेरे लिए बंदी  बना के रखा  है |

वही सूरत बसी है  अब भी  दिले-नादाँ में,
ठहरा है वक्त दिल की हर धडकने-अदा में |

माना कि इक ज़माना हुआ तुमसे जुदा हुए,
मन का आईना है तेरा वही अक्स लिए |

तुम न आये लौट कर, तो आना भी नहीं अब,
ऐसा न हो मन का जवाँ दर्पण चटख जाए |

मेरे महबूब जो तू अब अगर मिल जायगा ,
वक्त मुट्ठी से मेरे शायद फिसल जायगा ||

Thursday, September 22, 2011

ये इश्क़ जगाता क्यों है ?


पूछा है तो सुनो,
अब सो जाओ
लेकिन थकना मस्ट है पहले
थकने के लिए
चाहो तो जागो
चाहो तो भागो

कौन किसे छोड़ता है
जिसे देखो यहां वो नोचता है
हरेक दूसरे को निचोड़ता है
कोई कोई तो भंभोड़ता है
ख़ुशनसीब है वो जो तन्हा है
कि महफूज़  है मुकम्मल वो

सरे ज़माना आशिक़  मिलते कहां हैं ?
हॉर्मोन में उबाल प्यार तो नहीं
पानी बहा देना प्यार तो नहीं
क़तरा जहां से भी टपके
आख़िर भिगोता क्यों है
ये इश्क़ मुआ जगाता क्यों है ?

ये पंक्तियां डा. मृदुला हर्षवर्धन जी के इस सवाल के जवाब में

Wednesday, September 21, 2011

गीत ..हे मन...ड़ा श्याम गुप्त .....

                       मुशायरे की रफ़्तार  कुछ धीमी होचली है ...पता नहीं क्यों  ! ....खैर ..लीजिए .मैं ही अपनी पेशकश रखता हूँ.........मन की ही तो बात है.... होसकता है कि शायरों- कवियों का मन कुछ पेश करने को नहीं बन पा रहा हो ....इसी मन ...पर पेश है एक गीत ....................

हे मन ! प्रेम के तुम आधार ||

प्रेम की शिक्षा प्रीति की इच्छा,
तुम्हीं प्रेम  व्यापार |
तुम मानस, उर, चित, जिय, हियरा ,
तुम्हीं स्वप्न संसार |
तुमसे बनें भावना सारी ,
तुम्हीं प्रेम साकार |         
        हे मन ! प्रेम के तुम आधार ||
रूप  रंग  रस  भाव कार्य सब-
क्रिया-कलाप व्यवहार |
इक दूजे के मन को भाते ,
कर लेते अधिकार |
तन मन परवश होजाता तब-
तुम बन जाते प्यार |      
           हे मन ! प्रेम के तुम आधार ||
विह्वल भाव होजाते हो मन ,
बन आंसू आधार |
अंतर्मन में बस बन जाते ,
स्वप्नों का संसार |
श्याम का तन-मन स्मृति-वन हो -
उमड़े प्रेम अपार |
             हे  मन ! प्रेम के तुम आधार ||

Tuesday, September 20, 2011

...कृष्ण लीला......ड़ा श्याम गुप्त....

           (   दो  कुण्डलियाँ .)
सोलह हज़ार नारियाँ , परित्यक्ता गुमनाम |
निज रानी सम श्याम ने, उन्हें दिलाया मान |
उन्हें दिलाया मान, नयी जग रीति सजाई |
नहीं किसी की ओर ,कभी पर आँख उठायी |
जग में प्रथम प्रयास यह, नारी का उद्धार |
भ्रमवश कहते रानियाँ , थीं सोलहों  हज़ार ||

रीति निभाई जगत की, जो पटरानी आठ |
अन्य किसी के साथ कब श्याम निभाए ठाठ |
श्याम निभाए ठाठ, कहा जग माया संभ्रम |
जीवन राह में मिलें हज़ारों आकर्षण-भ्रम |
यही श्याम की सीख, योग है यही कृष्ण का |
जल, जल-जीव व पंक मध्य, नर रहे कमल सा ||

Saturday, September 17, 2011

कभी न छोटा समझें ......डा श्याम गुप्त

   (एक षट्पदी अगीत )

दुश्मन को पद-दलित धूलि को,
अग्नि,पाप, ईश्वर व सर्प को;
कभी न छोटा करके समझें |
इनके बल, गुण, कर्म भाव का,
नहीं  कभी  भी   अहंकार वश;
करें   उपेक्षा,    असावधानी ||

Friday, September 16, 2011

फ़िरक़ापरस्त

करते नहीं हैं फ़िरक़ापरस्ती का कुछ इलाज
अब फर्ज़ ए मंसबी से भी ग़ाफिल हैं हुक्मरां
देते नहीं ईंट का पत्थर से ये जवाब
फ़िरक़ापरस्त शेर हैं बुज़दिल हैं हुक्मरां


मतीन अमरोही

Tuesday, September 13, 2011

दाता तेरे हज़ारों हैं नाम - रज़िया "राज़"





दाता तेरे हज़ारों हैं नाम…(2)
कोई पुकारे तुझे रहीम,
और कोई कहे तुझको राम।दाता(2)
क़ुदरत पर है तेरा बसेरा,
सारे जग पर तेरा पेहरा,
तेरा राज़ बड़ा ही गैहरा,
तेरे इशारे होता सवेरा,
तेरे इशारे होती शाम।दाता(2)
ऑंधी में तुं दीप जलाए,
पत्थर से पानी तूं बहाये,
बिन देखे को राह दिख़ाये,
विष को भी अमृत तू बनाये,
तेरी कृपा हो घनश्याम।दाता(2)
क़ुदरत के हर-सु में बसा तू,
पत्तों में पौंधों में बसा तू,
नदिया और सागर में बसा तू,,
दीन-दु:ख़ी के घर में बसा तू,
फ़िर क्यों में ढुंढुं चारों धाम।दाता(2)
ये धरती ये अंबर प्यारे,
चंदा-सूरज और ये तारे,
पतझड़ हो या चाहे बहारें,
दुनिया के सारे ये नज़ारे,
देखूँ मैं ले के तेरा नाम।दाता(2) 
Source :  http://www.thenetpress.com/2009/08/blog-post_08.html

Monday, September 12, 2011

यदि तुम आजाते जीवन में ( महादेवी जी की पुण्य-तिथि पर.)...----डा श्याम गुप्त




.                                महीयसी  महादेवी  वर्मा जी की पुण्यतिथि पर .....उन्हीं की भाव-भूमि पर ...एक श्रृद्धा सुमन ...

यदि तुम आजाते जीवन में ,
निश्वासों में बस कर मन में |
कितने सौरभ कण से हे प्रिय!
बिखरा जाते इस जीवन में |

गाते रहते मधुरिम पल-छिन,
तेरे  ही गीतों का  विहान  |
जाने कितने वे इन्द्रधनुष,
खिल उठते नभ में बन वितान |

             खिल उठतीं कलियाँ उपवन में|
             यदि  तुम आजाते  जीवन में ||

महका  महका आता सावन,
लहरा लहरा  गाता सावन |
तन मन पींगें भरता नभ में ,
नयनों मद भर लाता सावन |

जाने  कितने  वर्षा-वसंत,
आते जाते पुष्पित होकर |
पुलकित होजाता जीवन का,
कोना कोना सुरभित होकर |

              उल्लास समाता कण कण में ,
              यदि तुम आजाते जीवन में ||

संसृति भर के सन्दर्भ सभी ,
प्राणों  की  भाषा बन् जाते |
जाने कितने नव-समीकरण,
जीवन  की  परिभाषा गाते |

पथ में  जाने  कितने दीपक,
जल उठते बनकर दीप-राग |
चलते हम तुम मन मीत बने,


बज उठते नव संगीत साज |

                 जलता राधा का प्रणय-दीप ,
                 तेरे मन के  वृन्दाबन में   |
                 यदि तुम आजाते जीवन में ||

इश्क़ की ताक़त

इश्क़ की एक जस्त ने तय कर दिया क़िस्सा तमाम
इस ज़मीनो आसमाँ को बेकराँ समझा था मैं

जो उर्दू नहीं जानते उनके लिए :-
जस्त यानि छलाँग , बेकराँ यानि अनंत
यह शेर बताता है कि जिन चीज़ों की इंतेहा समझना अक़्ल के बस से बाहर है , अपने रब से इश्क़ की बदौलत उनसे भी आगे देख सकता है ।

Saturday, September 10, 2011

                      कविता क्यों .....एक... श्याम सवैया  छंद ..

कविता क्यों भला करता है कवि, यूं जाग जाग कर रातों को |
कहता वह जीवन के अनुभव अपने मन की मधु यादों को |
जीवन के सत्य व शास्त्र सत्य,मानव व्यवहार की बातों को |
रखता जन मन के सम्मुख वह कुछ यथा तथ्य संवादों को |
सब जन हिताय, बहु जन हिताय लोकाचारी अनुनादों को |
हो राष्ट्र समाज देश उन्नत ,इस सोच में जागता रातों को ||

Monday, September 5, 2011

राधाष्टमी पर...ड़ा श्याम गुप्त के दो पद ......


जनम लियो वृषभानु लली ।
आदि -शक्ति प्रकटी बरसाने, सुरभित सुरभि चली।
जलज-चक्र,रवि तनया विलसति,सुलसति लसति भली ।
पंकज दल सम खिलि-खिलि सोहै, कुसुमित कुञ्ज लली।
पलकन पुट-पट मुंदे 'श्याम' लखि मैया नेह छली ।
विहंसनि लागि गोद कीरति दा, दमकति कुंद कली ।
नित-नित चन्द्रकला सम बाढ़े, कोमल अंग ढली ।
बरसाने की लाड़-लडैती, लाडन -लाड़ पली ।।

--
कन्हैया उझकि-उझकि निरखै
स्वर्ण खचित पलना,चित चितवत,केहि विधि प्रिय दरसै
जंह पौढ़ी वृषभानु लली , प्रभु दरसन कौं तरसै
पलक -पाँवरे मुंदे सखी के , नैन -कमल थरकैं
कलिका सम्पुट बंध्यो भ्रमर ज्यों ,फर फर फर फरकै
तीन लोक दरसन को तरसे, सो दरसन तरसै
ये तो नैना बंद किये क्यों , कान्हा बैननि परखै
अचरज एक भयो ताही छिन , बरसानौ सरसै
खोली दिए दृग , भानु-लली , मिलि नैन -नैन हरसें
दृष्टि हीन माया ,लखि दृष्टा , दृष्टि खोलि निरखै
बिनु दृष्टा के दर्श ' श्याम' कब जगत दीठि बरसै

Friday, September 2, 2011

त्रिपदा अगीत......ड़ा श्याम गुप्त.....

चाहत थी हम कहें बहुत कुछ ,
तुम हर लम्हा रहे लजाते;
हम  कसमसाते ही रह गए |

आगये खाली हाथ दर पे ,
पूछा क्या लाये तो बोले;
दिल दूसरा कहाँ से लाएं |

कहके  वफ़ा करेंगे सदा ,
वो  जफा करने लगे यारो;
ये कैसा सिला है बहारो  |

बात क्या बागे-बहारों की,
बात न हो चाँद सितारों की;
बात बस तेरे इशारों की |

प्रीति प्यार में नया नहीं कुछ ,
वही पुराना किस्सा यारो;
लगता शाश्वत नया नया सा ||