मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Wednesday, August 31, 2011

मेरी आँखों से कोई उन्हें देख ले

कोई उन्हें देख ले
मेरी मोहब्बत को
पहचान ले
निरंतर दिल में
उठ रहे
जलजले को जान ले
मेरा पैगाम उन तक
पहुंचा दे
हाल-ऐ-दिल उन्हें
बता दे
मुझे मंजिल तक
पहुंचा दे 
31-08-2011
1424-146-08-11

Tuesday, August 30, 2011

-कौन है वो...ड़ा श्याम गुप्त....

 कौन है वो  जो हरेक पल की आरज़ू बनकर |
 दिल के इन बंद दरीचों में समाये जाता |

किस के दामन की हवा का ये महकता झोंका ,
गमे-दरिया को भी इस दिल के बहाए जाता |

किसने यह छेड़ दिया राग बसन्ती आकर ,
झूमने गाने लगा दिल था जो गम से बोझिल |

किसकी वीणा की मधुर तान ने सरगम छेड़ी,
याद आने लगे  तन्हाई  में,  बीते  वो   पल |

हो चला झंकृत तन-मन का ये कोना कोना ,
बस गया कौन है ये नाद-अनाहत बनकर |

ये फिजाँ झूम के मचली तो हम ये जान गए,
तू ही इस राह से गुजरा है जुस्तजू बनकर  ||

Sunday, August 28, 2011

सच्चे मददगार

आंसू ही उमरे-रफ्ता के होते हैं मददगार,
न छोड़ते हैं साथ कभी सच्चे मददगार.

मिलने पर मसर्रत भले दुःख याद न आये,
आते हैं नयनों से निकल जरखेज़ मददगार.

बादल ग़मों के छाते हैं इन्सान के मुख पर ,
आकर करें मादूम उन्हें ये निगराँ मददगार.

अपनों का साथ देने को आरास्ता हर पल,
ले आते आलमे-फरेफ्तगी ये मददगार.

आंसू की एहसानमंद है तबसे ''शालिनी''
जब से हैं मय्यसर उसे कमज़र्फ मददगार.


कुछ शब्द-अर्थ:
उमरे-रफ्ता--गुज़रती हुई जिंदगी,
जरखेज़-कीमती,
मादूम-नष्ट-समाप्त,
आलमे-फरेफ्तगी--दीवानगी का आलम.

शालिनी कौशिक


Friday, August 26, 2011

एक उस्ताद शायर हैं मिर्जा दाग़ दहलवी का संक्षिप्त परिचय

मिर्ज़ा ‘दाग़’ को अपने जीवनकाल में जो ख्याति, प्रतिष्ठा और शानो-शौकत प्राप्त हुई, वह किसी बड़े-से-बड़े शाइर को अपनी ज़िन्दगी में मयस्सर न हुई। स्वयं उनके उस्ताद शैख़, ‘ज़ौक़’ शाही क़फ़स में पड़े हुए ‘तूतिये-हिन्द’ कहलाते रहे, मगर 100 रू० माहवारी से ज़्यादा का आबो-दाना कभी नहीं पा सके। ख़ुदा-ए-सुख़न ‘मीर’ ‘अमर-शाइर’ ‘गा़लिब’ और ‘आतिश’-जैसे आग्नेय शाइरों को अर्थ-चिन्ता जीवनभर घुनके कीड़े की तरह खाती रही। हकीम ‘मोमिन शैख़’ ‘नासिख़’ अलबत्ता अर्थाभाव से किसी क़द्र निश्चन्त रहे, मगर ‘दाग़’ जैसी फ़राग़त उन्हें भी कहाँ नसीब हुई
यूँ अपने ज़माने में एक-से-एक बढ़कर उस्ताद एवं ख्याति-प्राप्त शाइर हुए, मगर जो ख्याति और शुहरत अपनी ज़िन्दगीमें ‘दाग़’ को मिली, वह औरों को मयस्सर नहीं हुई। भले ही आज उनकी शाइरी का ज़माना लद गया है और मीर, दर्द, आतिश, ग़लिब, मोमिन, ज़ौक़, आज भी पूरे आबो-ताबके साथ चमक रहे हैं। लेकिन अपने ही जीवनकाल में उन्हें ‘दाग़’-जैसी ख्याति प्राप्त नहीं हो सकी।

जनसाधराण के वे महबूब शायर थे। उनके सामने मुशाअरो में किसी का भी रंग नहीं जमने पाता था। हजरत ‘नूह’ नारवी लिखते हैं कि -‘‘मुझसे रामपुर के एक सिन-रसीदा (वयोवृद्ध) साहब ने जिक्र किया कि नवाब कल्बअली खाँ साहब का मामूल था कि मुशाअरे के वक़्त कुछ लोगों को मुशाअरे के बाहर महज़ इस ख्याल बैठा देते थे कि बाद में ख़त्म मुशाअरा लोग किसका शेर पढ़ते हुए मुशाइरे से बाहर निकलते हैं। चुनाव हमेशा यही होता था कि ‘दाग़’ साहब का शेर पढ़ते हुए लोग अपने-अपने घरों को जाते थे।

‘‘एक बार मुंशी ‘मुनीर’ शिकोहाबादीने सरे-दरबार हजरत ‘दाग़’ का दामन थामकर कहा कि-‘क्या तुम्हारे शेर लोगों की ज़वानों पर रह जाते हैं और मेरे शेरों पर लोंगों की न ख़ास तवज्जह होती है, न कोई याद रखता है।’ इसपर जनाब ‘अमीर मीनाई’ ने फ़र्माया- ‘‘यह खुदादाद मक़बूलियत है, इसपर किसी का बस नहीं।’’

यह मशूहूर है कि दाग़ की ग़ज़ल के बाद मुशआर के किसी शाइर का शेर विर्दे-जबा़न न होता था। ‘असीर’ (अमीर मीनाई के उस्ताद) का मक़ूला है कि वह कलाम पसन्दीदा है, जो मुशाअरे से बाहर जाये। फ़र्माते थे कि मैंने बाहर जाने वालों में अक्सर मिर्जा ‘दाग़’ का शेर बाहर निकलते देखा है।

हज़रत मुहम्मदअली खाँ ‘असर’ रामपुरी लिखते हैं-‘‘जब ‘दाग़’ मुशाअरे में अपनी ग़ज़ल सुनाते थे, तो रामपुर के पठान उन्हें सैकड़ों गालियाँ देते थे। दारियाफ़्त किया गया कि गालियों का क्या मौका था। पता चला कि कलाम की तासीर (असर) और हुस्ने-कुबून (पसन्दीदगी) का यह आलम था कि पठान बेसाख्ता चीख़ें मार-मार कर कहते थे कि-‘उफ़ ज़ालिम मार डाला।’ ओफ़्फोह ! गला हलाल कर दिया। उफ़-उफ़ सितम कर दिया, ग़ज़ब ढा दिया।

एक दिन नवाब खुल्द-आशियाँने नवाब अब्दुलखाँ से पूछा कि ‘दाग़’ के मुतअल्लिक़ तुम्हारी क्या राय है। जवाब दिया कि -‘‘तीतड़े में गुलाब भरा हुआ है।’’ मक्सद यह है कि सूरत तो काली है, लेकिन बातिन (अंतरंग) गुलहार-मआनीकी खुशबुओ (कविता-कुसुम की सुगन्धों) से महक रहा है।



जब उनकी ग़ज़ले थिरकती थीं। यहाँ तक कि उनकी ख्यातिसे प्रभवित होकर उनके कितने समकालीन शाइर अपना रंग छोड़कर रंगे-दाग़ में ग़ज़ल कहने लगे थे। दाग़ की ख्याति और लोक-प्रियता का यह आलम था कि उनकी शिष्य मण्डली में सम्मलित होना बहुत बड़ा सौभाग्य एवं गौरव समझा जाता था। हैदराबाद-जैसे सुदूर प्रान्त में ‘दाग़’ के समीप जो शाइर नहीं रह सकते थे, वे लगभग शिष्य संशोधनार्थ ग़ज़लें भेजते थे। ‘दाग़’ का शिष्य कहलाना ही उन दिनों शाइर होने का बहुत बड़ा प्रमाणपत्र समझा जाता था और उन दिनों क्यों, आज भी ऐसे शाइर मौजूद हैं, जिन्हें ब-मुश्किल एक-दो ग़ज़लों पर इस्लाह लेना नशीब होगा, फिर भी बड़े फ़ख़्र के साथ अपनेको मिर्जा ‘दाग़’ का शिष्य कहते हैं।
साभार : http://podcast.hindyugm.com/2008/10/mirza-daag-dehalvi-and-his-kalaam.html 

शिशिर पारखी की आवाज़ में मिर्जा दाग़ दहलवी की ग़ज़ल

Thursday, August 25, 2011

कुछ कलाम पानीपत के मुशायरे से

पानीपत । जामिया दारूल उलूम ट्रस्ट हाली कॉलोनी की में शायर ताहिर सदनपुरी की तरफ़ से टी. वी. कलाकार राजेन्द्र गुप्ता के सम्मान में एक मुशायरे का आयोजन किया गया। इसमें ख़ास तौर पर ये शेर ज़्यादा पसंद किए गए ।
फ़लक के चांद को मुश्किल में डाल रखा है
ये किसने खिड़की से चेहरा निकाल रखा है
शायर - इक़बाल अहमद ‘इक़बाल‘

तूने जब ख़त्म ही कर डाले हैं रिश्ते सारे
फिर ये सावन तेरी आंखों से बरसता क्यूं है
शायर - महबूब अली ‘महबूब‘

सीने से दिल निकाल कर क़दमों पे रख दिया
वो कैसे मेरे प्यार से इन्कार करेंगे
शायर - शकील सीतापुरी

वतन के हुक्मरानो , ग़लतफ़हमी में मत रहना
ये बूढ़ी हड्डियां इस मुल्क का चेहरा बदल देंगी
शायर - पंडित शिवकांत ‘विमल‘

कुछ कलाम पानीपत के मुशायरे से

Wednesday, August 24, 2011

कृष्ण जन्म ......पद...ड़ा श्याम गुप्त ...




बृज की भूमि भई है निहाल |
आनंद-कंद प्रकट भये बृज में,विरज भये बृज ग्वाल |
 सुर गन्धर्व अपछरा गावंहि, नाचहिं  दै दै ताल |
आशिस देंय विष्णु ब्रह्मा शिव, मुसुकावैं गोपाल |
 जसुमति द्वारे बजै बधायो,  ढफ ढपली खड़ताल |
पुरजन परिजन हरख मनावें, जनमु लियो नंदलाल |
बाजहिं, ढोल, मृदंग ,मंजीरा,  नाचहिं  बृज के बाल | 
सुर दुरलभ छवि निरखि-निरखि छकि श्याम' भये हैं निहाल ||

Monday, August 22, 2011

रमज़ान की विदाई -डा. फ़ितरतुल्लाह अंसारी ‘फ़ितरत‘

हरेक मोमिन को आज ‘फ़ितरत‘ ख़याले फ़ुरक़त सता रहा है
बदल रहा है निज़ामे आलम के माहे रमज़ान जा रहा है

अजीब माहौल है जहां का उदासियां ही उदासियां हैं
ज़मीं की हालत भी है दीगर गूं फ़लक भी आंसू बहा रहा है

ज़रा तो छोड़ो ये ख्वाबे ग़फ़लत के वक्त कुछ भी नहीं है बाक़ी
कहां मयस्सर ये होगा तुम को क़ुरआं जो हाफ़िज़ सुना रहा है

ख़ुदा की रहमत बरस रही है खुला हुआ है दरे इजाबत
जो सो रहा है वो खो रहा है जो जागता है वो पा रहा है

ख़ुदा पे ईमान रखने वालों ख़ुदा का फ़रमान ये भी सुन लो
उसी को जन्नत मिलेगी इक दिन जो दिल से महवे दुआ रहा है

फ़िज़ा ए अफ़्तार में सहर में हर एक ज़र्रे में बहर ओ बर्र में
है चश्मे बीना तो देख लो तुम वो अपना जलवा दिखा रहा है

ना तुम रहोगे ना मैं रहूंगा न रह सकेगी जहां की रौनक़
ये अलविदा का पयाम ‘फ़ितरत‘ ये चश्म पुर नम सुना रहा है

डा. फ़ितरतुल्लाह अंसारी ‘फ़ितरत‘

Sunday, August 21, 2011

जन्माष्टमी पर एक पद...... ड़ा श्याम गुप्त ..


कैसी लीला रची गुपाल |
लूटि लूटि दधि-माखन खावें छकि हरखें ब्रिज-बाल |
क्यों हमको दधि-माखन वर्जित मथुरा नगर पठावें |
धन-संपदा ग्राम की घर की , नंदलाल समुझावें |
नीति बनाओ , दधि-माखन जो मथुरा लेकर जाय |
फोरि  गगरिया लूटि लेउ सब नगर न पहुंचन पाय |
हम बनिहें बलवान-संगठित , रक्षित सब घर-द्वार |
श्याम' होयँ संपन्न सुखी सब ,सहें न अत्याचार ||

Thursday, August 18, 2011

अन्ना हज़ारे

कहता है नजूमी ये हिसाब अपना लगाकर
कि आज का दिन है और हकूमत पे भारी
कल तक तो निकल जाएंगे गर्दिश से सितारे
हो जाएंगे खामोश सब अन्ना के पुजारी

मतीन अमरोही

भारत वर्ष हमारा.

गूगल से साभार
तू ही खल्लाक ,तू ही रज्ज़ाक,तू ही मोहसिन है हमारा.
रहे सब्ज़ाजार,महरे आलमताब भारत वर्ष हमारा.

एक आशियाँ बसाया हमने चैनो -अमन  का   ,
नाकाबिले-तकसीम यहाँ प्यार हमारा.

कुदरत के नज़ारे बसे हैं इसमें जा-ब-जा,
ये करता तज़्किरा है संसार हमारा.

मेहमान पर लुटाते हैं हम जान ये अपनी ,
है नूर बाज़ार-ए-जहाँ ये मुल्क  हमारा.

आगोश में इसके ही समां जाये ''शालिनी''
इस पर ही फ़ना हो जाये जीवन ये हमारा.

कुछ शब्द अर्थ-
खल्लाक-पैदा करने वाला,रज्ज़ाक-रोज़ी देने वाला
मोहसिन-अहसान करने वाला,सब्ज़ाजार-हरा-भरा
महरे आलमताब -सूरज,नाकाबिले-तकसीम--अविभाज्य
तज़्किरा-चर्चा,बाज़ार-ए-जहाँ--दुनिया का  बाज़ार
आगोश-गोद या बाँहों में,जा-ब-जा--जगह-जगह
शालिनी कौशिक

Tuesday, August 16, 2011

भारत की हर बात निराली....ड़ा श्याम गुप्त....






 पर  भा की बात निराली 

सारा जग सुंदर अति सुंदर,
पर भारत की बात निराली |
गूंजे  प्रेम-प्रीति की भाषा ,
 वन उपवन तरु डाली डाली |
मेरे देश की बात निराली,
भारत की हर बात निराली ||



गली गली है गीत यहाँ की ,
गाँव शहर संगीत की थिरकन |
पगडंडी सी   नीति -कथाएं ,
हाट डगर मग प्रीति की धडकन |
नदी नहर जल मधु की प्याली , 
पथ पथ सत् की कथा निराली |

प्रेम की भाषा डाली डाली .
इस भारत की बात निराली ||

अपने अपने नियम धर्म सब,
अपने अपने ब्रह्म ईश सब |
अपनी अपनी कला कथाएं ,
अपनी अपनी रीति व्यथाएँ |
अलग अलग रंग प्रीति निराली ,
भिन्न भिन्न हर ड़ाली डाली |

एक तना जड़ एक निराली,
इस भारत की बात निराली ||

कर्म के साथ धर्म की भाषा ,
अर्थ औं काम मोक्ष अभिलाषा |
जीवन की गतिमय परिभाषा |
विविधि धर्म मत जाति के बासी ,
बहु विचार बहु शास्त्र कथा सी |
भोर-सांध्य की प्रेम-व्यथा  सी |

बहुरंगी संस्कृति की थाली,
प्रेम की भाषा डाली डाली ||

गीता स्मृति वेद उपनिषद ,
गूढ़  कथाएं ये पुराण सब |
विविधि शास्त्र इतिहास सुहाना,
 कालिदास प्रभृत्ति विद्वाना |
सुर  भूसुर  भूदेव  महीसुर,
नर-नारायण, संत कवीश्वर |

प्रथम भोर ऊषा की लाली ,
प्रिय भारत की छटा निराली ||

Monday, August 15, 2011

बजी मंदिर में घंटी और मस्जिद में अजां


जहाँ हर चीज है प्यारी
सभी चाहत के पुजारी
प्यारी जिसकी ज़बां
वही है मेरा हिन्दुस्तां

जहाँ ग़ालिब की ग़ज़ल है
वो प्यारा ताज महल है
प्यार का एक निशां
वही है मेरा हिन्दुस्तां

जहाँ फूलों का बिस्तर है
जहाँ अम्बर की चादर है
नजर तक फैला सागर है
सुहाना हर इक मंजर है
वो झरने और हवाएँ,
सभी मिल जुल कर गायें
प्यार का गीत जहां
वही है मेरा हिन्दुस्तां

जहां सूरज की थाली है
जहां चंदा की प्याली है
फिजा भी क्या दिलवाली है
कभी होली तो दिवाली है
वो बिंदिया चुनरी पायल
वो साडी मेहंदी काजल
रंगीला है समां
वही है मेरा हिन्दुस्तां

कही पे नदियाँ बलखाएं
कहीं पे पंछी इतरायें
बसंती झूले लहराएं
जहां अन्गिन्त हैं भाषाएं
सुबह जैसे ही चमकी
बजी मंदिर में घंटी
और मस्जिद में अजां
वही है मेरा हिन्दुस्तां
से साभार 

Sunday, August 14, 2011

!!!मैं इतनी लालची भी नही!!!

तुम एक बार कहो तो सही,
मैं इस दुनिया का,
सब कुछ छोड़ सकती हु,
तुम्हारे लिए,
ये कपडे ये गहने,
ये झुमके ये कंगन,
ये आराम भरा जीवन,
ये दौलत ये शोहरत,
ये बनी बनाई किस्मत,
ये खाना ये पानी,ये सब रंग जबानी,
ये घुमना ये फिरना 
ये सजना सबरना,
ये खुशिया मानना,
ये यू मुस्कुराना,
ये सांसे ये धड़कन,
ये जीवन का पल पल,
ये पाने की तमन्ना,
ये खोने का भय,
सब छोड़ दू मैं,
पर एक बात कहू...?तुम सच में मुझे,
लालची तो न समझोगे न...?
आखिर कर,
मैं हु तो एक औरत ही ना
सब कुछ छोड़ने के बाबजूद भी,
बस तुम्हे पाने का,
तुम्हारे साथ रहने का,और तुम्हारे साथ जीने का 
जो लोभ है,जो मोह है, 
 लाख कोशिशो के बाबजूद भी,
वो मुझसे जाने क्योँ,
 छुटता ही नही.......................................................!!


Source : http://www.facebook.com/notes/arti-jha/%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%87%E0%A4%A4%E0%A4%A8%E0%A5%80-%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A4%9A%E0%A5%80-%E0%A4%AD%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A4%B9%E0%A5%80/169418036459783

तू वही है...गज़ल...ड़ा श्याम गुप्त ....

 तू वही है |
तू वही है |

प्रश्न गहरा ,
तू कहीं है?

कौन कहता,
तू नहीं है |

जहां ढूंढो,
तू वहीं है |

है भी तू, 
है भी नहीं है |

तू कहीं है,
या नहीं है |

श्याम 'मुद्दा ,
बस यही है ||

Friday, August 12, 2011

दो मुट्ठी मिट्टी मेरी कब्र पर डाल देना ,जो मुझे ना मिल सका मेरी लाश को दे देना

इंतज़ार तुम्हारा

ज़िन्दगी भर किया

रातों को जागता रहा

निरंतर

अश्क बहाता रहा

इज़हार-ऐ-मोहब्बत का

जवाब ना मिला

मेरे हसरतों का खून

हो गया

अब आखिरी इल्तजा

सुन लो मेरी

मरने के बाद

सुकून के खातिर

दो मुट्ठी मिट्टी मेरी

कब्र पर डाल देना

जो मुझे ना मिल सका

मेरी लाश को दे देना

अपनी बेरुखी पर पर्दा

डाल देना

12-08-2011

1347-69-08-11

हल्की-फ़ुल्की सी तक़रार करो



जब किसी से कभी भी प्यार करो
अपने दिल का तो इज़हार करो
जब किसी से कभी भी....

वक़्त रहता नहीं कभी यकसाँ 
मौक़ा मिलते उनका दीदार करो
जब किसी से कभी भी....

लौट आएगा पुराना वो शमाँ
दिल से ऐसी कुछ पुकार करो
जब किसी से कभी भी....

छुप गया है बादलों में कोई
ऐसे तारे का बस इन्तिज़ार करो
जब किसी से कभी भी....

जब कभी भी किसी से प्यार करो
हल्की-फ़ुल्की सी तक़रार करो
जब किसी से कभी भी....

Thursday, August 11, 2011

रिश्ते और फिज़ा -डॉ. शमा खान



रिश्ते और फिज़ा बरबस बांधने का गुर रखते हैं,
बिखर जाएँ तो हर निशान मिटने का दंभ भरते हैं

न हो टकराहट,आहत भी कोई न करे
तो खुद भी फलें ,फलने तुम्हें भी दें

रिश्ते औ फिजा तो मन की डोर से बंधे हैं
जेहन के दाव पेंच कहाँ ये समझते हैं

मैं 'मैं' हूँ जताने में जहन तो सब तबाह करती है
दिल टूटते हैं,तो दरारें जमी पर पड़ती हैं
कहीं आँखों से तो कहीं समुन्द्र से लहरें उठती हैं

रुदन फूट पड़ता है,जब गम हद से गुज़रता है
ज़लज़ला-ए-सुनामी का रूप भी धरता है
टूट जाते हैं सपने चाँद पर बसने के
धरती का घरोंदा भी कहाँ बच पता है

रह जाती हैं बस अतीत की मधुर स्मृतियाँ
पाने और खोने की भूल भुलैय्या में

झूलती सी ,ठिठकी सी मनु अपने से पूछती है,
प्रेम ही तो न हुआ,अपनों से.......,फिजा से.....,रिश्तों से

डॉ. शमा खान

आदमी और जानवर

दी गई हैं उन्हें सज़ाएं कि जो
जानवर का शिकार करते हैं
और छोड़ा गया उन्हें आज़ाद
आदमी पर जो वार करते हैं
हलीम साबिर

Wednesday, August 10, 2011

जीवन का दर्शन -Dr. Shama Khan

तन्हा होने पर ये जीवन का दर्शन समझ  मे  आता है .
 मै क्या  हूँ , वो क्या है  फ़लसफ़ा  समझ  मै आता  है .
                   जब  रिश्तो  म़े बढ़ जाती  है  दूरिया,
                   हर ओर  छा जाती  है  ख्मोशिया
                    जब हर  पल  मन हो जाता  है  बैचन,
                      बार बार  लहेरो  से जूझ  कर भी ,
              किनारे  खड़ा  पाता है मन .
                                            ये  आदमी  की  फितरत  है  शायद
                                          टूटते  रहने पर भी  नित  नये रिश्ते  बनाता है
                                           धोखा  खा , हाथ  झाड़कर  खड़े  हो जाता  है
                        एक  ओर  रिश्ता बनाने को ,आगे कदम बढाता है .
  क्या  खोया है ,क्या  पाया है  का  समीकरन  मन  बैठाता है ,
कहा लूटा  है ,कंहा लुटा, सोच  मन पछताता  है .
कण -कण म़े ,हर  धड़कन  मे, फिर  भी तलाशता  रहता  है मन
माँ  के  आंचल  मे ,दोस्त  की  अठखली मे ,बेटी  के अपनेपन  मे ,
प्रेमी के सपनों मे ,जीवन का हर पल जीता है . 

रुबाई ....जंग...ड़ा श्याम गुप्त.....

घर हो   बाहर हो   जंग  हर जगह  पे  जारी है |
कहीं सांस्कृतिक हमला है कहीं आतंकी तैयारी है|
खुशनसीं  हैं 'श्याम, जो  देश की सरहद  पे  लड़े -
अंदर के दुश्मनों से लड़ें अब हमारी बारी है ||



Sunday, August 7, 2011

कश्ती कोई तन्हा नहीं होती The boat



धरती पर
मौसम की तरह
बदलते हैं हालात
कि इंसान भी
उपजा है
धरती से ही
और खाता है
धरती से ही
और बसेरा उसका
धरती पे ही

धरती,
जो समेटे है
अपने अंक में
हर सागर को
गागर की तरह
एक मां की भांति

टूटी कश्तियों के साथ भी
चलती हैं लहरें
बहता है पवन
झूमता है गगन
चाहे कश्ती कोई
यह सब जाने ना

वंदना जी ! आपकी रचना 'कुछ कश्तियां अकेले बहने को मजबूर होती हैं' पढ़कर अच्छा लगा और यह भाव मन में आए शायद कि आपके दिल को भाए ?

Saturday, August 6, 2011

जौनपुर का पुल (नज़्म) Jaunpur Ka Pul

जौनपुर का पुल

एक हिंदू एक मुस्लिम यानि दो राजों का राज
अहले इल्मो-फ़ज़्ल का था जमघटा
हुक्म चलता था यहां शाहाने शरक़ी का कभी
फिर हुकूमत हो गई शाही मुग़ल सुल्तान की
दानिशो-हिकमत का यहां था ग़लग़ला
खि़त्ता ए यूनान इसको जानिए
देखिए मस्जिद अटाला और कहिए वाह वाह
सरवरों की सरवरी पहचानिए
शायरों की शायरी है आज भी
दूसरों से कम नहीं थी कम नहीं है आज भी
आते आते हुक्मरानी आई आलमगीर की
जिसको औरंगज़ेब भी कहते हैं लोग
आदिलो-मुन्सिफ़ था ग़ाज़ी उसको रिआया थी अज़ीज़
हां जौनपुरी रिआया यूं परेशां हाल थी
जो नदी गुज़री हुई है शहर से
धीरे धीरे बढ़ते बढ़ते थी वबाले जान भी
बेबसी बेचारगी में मुब्तला थी ज़िंदगी
रफ़्ता रफ़्ता बात पहुंची हज़रत ए सुल्तान तक
शाह के इंजीनियर थे हुक्म की तामील में
रोज़ो शब कोशां रहे हर वक्त सरगरदां रहे
हुक्म मामूली न था फ़रमाने औरंगज़ेब था
ऐसा पुल तामीर हो जिसकी न हो कोई मिसाल
नाम रौशन हो हर इक मज़्दूर का
ईंट गारे और पत्थर की हक़ीक़त कुछ नहीं
दिल अगर कारीगरों का मुख़लिसो बेबाक हो
है वही पुल जो बना था तीन सदियों पेशतर
किस मसाले से बनाया पत्थरों को जोड़कर
आज तक कोई समझ पाया नहीं
कीमियागर सर पटकते रह गए
थे वही सब संगो खि़श्त लेकिन जौनपुरी दिमाग़ ?
और शाही परवरिश के साथ वो नामो नुमूद
आज तक पैदा न कर पाया कोई भी नामवर
एक भी पत्थर निकल जाए अगर
जोड़ने वाला कोई पैदा नहीं
शहर के कारीगरों को कीजिए झुक कर सलाम
काम से रौशन हुआ करता है नाम

शायर
अनीस मुनीरी , एम. ए.
दीवान - रम ए आहू
पृष्ठ सं. 136-138
किताब मिलने का पता
मदरसा क़ासिम उल उलूम
अंसार नगर, रखियाल रोड
अहमदाबाद 23
अटाला  मस्जिद का दरवाज़ा 


शब्दार्थ
इल्मो फ़ज़्ल-ज्ञान और श्रेष्ठता , शाहाने शरक़ी-शरक़ी बादशाह
दानिशो हिकमत-तत्वदर्शिता और दर्शन , ग़लग़ला-दबदबा
खि़त्ता ए यूनान-यूनान का इलाक़ा (यूनान ज्ञान, विज्ञान, कला और दर्शन में बहुत मशहूर था, इसीलिए उसकी मिसाल दी गई है)
सरवरों की सरवरी-बादशाहों की बादशाही,
आदिलो मुन्सिफ़-न्यायप्रिय, ग़ाज़ी-युद्ध में विजेता,रिआया-प्रजा,
अज़ीज़-प्यारी, रफ़्ता रफ़्ता-धीरे धीरे, हज़रत ए सुल्तान-बादशाह
हुक्म की तामील-आदेश का पालन, रोज़ो शब-दिन रात, कोशां-कोशिश में लगे होना, सरगरदां-चिंतामग्न, मुख़लिस-सत्यनिष्ठ, बेबाक-साफ़ बात कहने वाला
पेशतर-पहले, कीमियागर-केमिस्ट्री के विशेषज्ञ, संगो खि़श्त-पत्थर और मिट्टी
अटाला मस्जिद का अंदरूनी मंज़र

Friday, August 5, 2011

क्यूं बार-बार दरकते है रिश्ते ? Rishte

 क्यूं बार-बार दरकते है रिश्ते, 
अपने को अपने में ढूंढ़ते है रिश्ते.
खून भी वही है, रंग भी वही,
दर्द भी वही है,अहसास भी वही
फिर क्यु जहर में घुलते हैं रिश्ते .
ज़मीं भी वही है , फ़िज़ा  भी वही
गुल भी वही,गुले बहार भी वही
फिर क्यूं  दर-दर भटकते है रिश्ते
गर मोहब्बत हुई होती कम ,तो बात और थी,
यहाँ तो सियासत ने बदल दिए है रिश्ते
अब तो बार-बार आँखों से ढलकते है रिश्ते,
विश्वास को मार भय में जीते हैं रिश्ते. 
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ये पंक्तियां हमें डा. शमा ख़ान ने हमारे एक लेख पर टिप्पणी के तौर पर भेंट की हैं।
हमें ये पसंद आई हैं और उम्मीद है कि आपको भी पसंद आएंगीं।

Thursday, August 4, 2011

मैं सुन रहा हूं चीत्कार चिताओं का The Burning Soul


सभ्यता के श्मशान में
हड्डियों के ढेर पर
मांस की चादर में
बेरंग आत्मा
जब सुलगती है तो
चीत्कार ज़रूरी है
लेकिन इसे सुनता वही है
जो ख़ुद सुलग रहा हो
हां,
मैं सुन रहा हूं चीत्कार
चिताओं का, चिंताओं का
अबलाओं का, मांओं का
करूण क्रंदन
हर घड़ी हर पल
क्योंकि वह प्रतिध्वनि है
मेरे ही अंतर्मन की

आज वंदना जी के ब्लॉग पर गए और उनकी रचना पढ़ी 
‘कभी देखा है चिता को चीत्कार करते हुए ?‘
तब हमने तुरंत ही उपरोक्त रचना के माध्यम से उन्हें जवाब दे दिया।
आपको हमारा जवाब कैसा लगा ?
बताइयेगा ज़रूर !!!

Wednesday, August 3, 2011

कतआ ---ड़ा श्याम गुप्त......

पहले खुद को , तो खुदी में  निहारो यारो |
सूरतो-दिल को ,  आईने  में उतारो यारो |
फिर ये कहना, मेरे अशआर नहीं है काबिल-
अपनी ग़ज़लों के पुर-अक्श तो संवारो यारो ||

Tuesday, August 2, 2011

रमज़ान

होंठो पे दुआ लेकर रमज़ान आ गया है
हर दुख की दवा लेकर रमज़ान आ गया है
रोज़े की ताज़गी से चेहरे खिले मिलेंगे
रहमत की हवा लेकर रमज़ान आ गया है
तहसीन मुनव्वर