मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Tuesday, December 27, 2011

ये औरत ही है !


ये औरत ही है !


पाल कर कोख में जो जन्म देकर बनती है जननी

औलाद की खातिर मौत से भी खेल जाती है .


बना न ले कहीं अपना वजूद औरत

कायदों की कस दी नकेल जाती है .


मजबूत दरख्त बनने नहीं देते

इसीलिए कोमल सी एक बेल बन रह जाती है .


हक़ की आवाज जब भी बुलंद करती है

नरक की आग में धकेल दी जाती है




फिर भी सितम सहकर वो मुस्कुराती है

ये औरत ही है जो हर ज़लालत झेल जाती है .


शिखा कौशिक

[vikhyaat ]












4 comments:

DR. ANWER JAMAL said...

Wah ...

Nice post .

बहार हो कि खिज़ां मुस्कुराए जाते हैं,
हयात हम तेरा एहसाँ उठाए जाते हैं |

समझ सको तो हैं काफी ये आँख में आंसू,
के दिल के ज़ख्म किसे कब दिखाए जाते हैं |

कोई भ़ी लम्हा क़यामत से कम नहीं फिर भ़ी,
तुम्हारे सामने हम मुस्कुराए जाते हैं |

वन्दना said...

बेह्द उम्दा

sushma 'आहुति' said...

बेहतरीन........आपको नववर्ष की शुभकामनायें

***Punam*** said...

हक़ की आवाज जब भी बुलंद करती है
नरक की आग में धकेल दी जाती है

aur samaj ke har parivaar mein kahin n kahin kisi n kisi roop mein aapki ye panktiyan sahi baith jaati hain...kuchh saamne hoti hain aur kuchh parde ke peeche...

bahut khoob....