मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, February 12, 2012

मुझे तो मेरी जमीं, मेरा आसमान मिले

  • ये चाह कब है मुझे सब-का-सब जहान मिले,
    मुझे तो मेरी जमीं, मेरा आसमान मिले।

    कमी नहीं है सजावट की इन मकानों में,
    सुकून भी तो कभी इनके दरमियान मिले।

    अजीब वक्त है सबके लबों पे ताले हैं,
    नजर नजर में मगर अनगिनत बयान मिले।

    जवां हैं ख्वाब क़फ़स में भी जिन परिंदों के,
    मेरी दुआ है उन्हें फिर नई उड़ान मिले।

    हमारा शहर या ख्वाबों का कोई मक़तल है,
    क़दम क़दम पे लहू के यहाँ निशान मिले।

    हो जिसमें प्यार की खुशबू, मिठास चाहत की,
    हमारे दौर को ऐसी भी इक जुबान मिले।

    --नीरज

14 comments:

sushma 'आहुति' said...

ये चाह कब है मुझे सब-का-सब जहान मिले,
मुझे तो मेरी जमीं, मेरा आसमान मिले।बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति
आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 13-02-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

शिखा कौशिक said...

BAHUT SUNDAR PRASTUTI .AABHAR

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर और सार्थक रचना!

sangita said...

ये चाह कब है मुझे सब-का-सब जहान मिले,
मुझे तो मेरी जमीं, मेरा आसमान मिले।बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.

vandana said...

शानदार गज़ल

अरूण साथी said...

जवां हैं ख्वाब क़फ़स में भी जिन परिंदों के,
मेरी दुआ है उन्हें फिर नई उड़ान मिले।


एक एक शेर जज्बातों की धरोहर है, आभार।

Naveen Mani Tripathi said...

जवां हैं ख्वाब क़फ़स में भी जिन परिंदों के,
मेरी दुआ है उन्हें फिर नई उड़ान मिले।

हमारा शहर या ख्वाबों का कोई मक़तल है,
क़दम क़दम पे लहू के यहाँ निशान मिले।

Wah jamal sahab kya khoob likhte hain .

Naveen Mani Tripathi said...

जवां हैं ख्वाब क़फ़स में भी जिन परिंदों के,
मेरी दुआ है उन्हें फिर नई उड़ान मिले।

हमारा शहर या ख्वाबों का कोई मक़तल है,
क़दम क़दम पे लहू के यहाँ निशान मिले।

Wah jamal sahab kya khoob likhte hain .

vidya said...

बेहतरीन गज़ल...
सांझा करने का शुक्रिया सर.

Dev said...

Sundar abivyakti

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

lajabab, behtarin, dilkash

सदा said...

वाह ...बहुत बढि़या।

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

बहुत उम्दा ग़ज़ल... वाह!