मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Tuesday, December 20, 2011

मुझको अहसास का ऐसा घर चाहिए

Farhat Durrani

जिंदगी चाहिए मुझको मानी भरी,
चाहे कितनी भी हो मुख्तसर, चाहिए।

...
लाख उसको अमल में न लाऊँ कभी,
शानोशौकत का सामाँ मगर चाहिए।

जब मुसीबत पड़े और भारी पड़े,
तो कहीं एक तो चश्मेतर चाहिए।

हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए,
मैं परिंदा हूं उड़ने को पर चाहिए।

मैंने मांगी दुआएँ, दुआएँ मिलीं
उन दुआओं का मुझपे असर चाहिए।

जिसमें रहकर सुकूं से गुजारा करूँ
मुझको अहसास का ऐसा घर चाहिए।


--कन्हैयालाल नंदन

5 comments:

Rajesh Kumari said...

kya kahne is ghazal ke farhar duraani ji bahut umda likhti hain.

sushma 'आहुति' said...

खुबसूरत अल्फाजों में पिरोये जज़्बात....शानदार |

अरूण साथी said...

साधु-साधु

sangita said...

shandar post

vandana said...

जब मुसीबत पड़े और भारी पड़े,
तो कहीं एक तो चश्मेतर चाहिए।

बेहतरीन पोस्ट