मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Sunday, January 22, 2012

बहार हो कि खिज़ां मुस्कुराए जाते हैं Bahaar

फेसबुक की सौग़ात

बहार हो कि खिज़ां मुस्कुराए जाते हैं,
हयात हम तेरा एहसाँ उठाए जाते हैं |
सुलगती रेत हो बारिश हो या हवाएं हों,
ये बच्चे फिर भ़ी घरौंदे बनाए जाते हैं |
ये एहतमाम मुहब्बत है या कोई साज़िश,
जो फूल राहों में मेरी बिछाए जाते हैं |
समझ सको तो हैं काफी ये आँख में आंसू,
के दिल के ज़ख्म किसे कब दिखाए जाते हैं |
कोई भ़ी लम्हा क़यामत से कम नहीं फिर भ़ी,
तुम्हारे सामने हम मुस्कुराए जाते हैं |

10 comments:

sheena said...

I appreciate the amount of effort you put into making this blog. Very detailed and astonishing piece of work. I hope that you can extend your work to a wider set of audience
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नीरज गोस्वामी said...

सुलगती रेत हो बारिश हो या हवाएं हों,
ये बच्चे फिर भ़ी घरौंदे बनाए जाते हैं

बेहद खूबसूरत ग़ज़ल...दाद कबूल करें...

नीरज

Kunwar Kusumesh said...

ये ग़ज़ल अच्छी है.
शायर का नाम भी होना चाहिए था.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की जयंती पर उनको शत शत नमन!

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर ग़ज़ल । धन्यवाद।

sushila said...

बहुत सुंदर!

अरूण साथी said...

साधु-साधु

vandana said...

sundar prastuti

Shanti Garg said...

कुछ अनुभूतियाँ इतनी गहन होती है कि उनके लिए शब्द कम ही होते हैं !

Shanti Garg said...

कुछ अनुभूतियाँ इतनी गहन होती है कि उनके लिए शब्द कम ही होते हैं !