मुशायरा::: नॉन-स्टॉप

Thursday, November 17, 2011

...काश मैं सब के बराबर होता

इस बलन्दी पे बहुत तन्हा हूँ,
काश मैं सब के बराबर होता |
उसने उलझा दिया दुनिया में मुझे,
वरना एक और कलंदर होता ||

8 comments:

sushma 'आहुति' said...

बहुत ही अच्छी.....

सागर said...

very nice....

Kunwar Kusumesh said...

अनवर जमाल भाई,
मेरा तो मानना है की:-
बलंदी कुछ है , इक भरम है.
मिला जो भी वो अल्लाह का करम है.

sushma 'आहुति' said...

bhaut khub....

दिगम्बर नासवा said...

हर किसी में काबलियत होती है कलंदर बन्ने की ... पर वक्त साथ नहीं देता ... अच्छा मुक्तक है ...

मनीष सिंह निराला said...

बहुत सुन्दर ..!
आयें मेर ब्लॉग पे आपका स्वागत है ! !
सदस्य बन रहा हूँ !

amarshiv said...

gazab ki bat kahi hai

DR. ANWER JAMAL said...

आप सभी का बहुत बहुत शुक्रिया !!!
कुंवर साहब आपका मानना ही वास्तव में ठीक है।
यह तो तत्व का ज्ञान है और माअरिफ़ना कलाम है।

जज़ाकल्लाह !!!
अर्थात दयालु दाता परमेश्वर आपको इसका अच्छा बदला दे।
आमीन !!!